आज खुद में ही अकेला / Aaj khud mein Akela
आज खुद में ही अकेला
रह गया खुद में ही अकेला,
ख्वाब मखमली सोने ना दे।
कलवटें रात भर नींद पुरी होये ना,
सपने अधुरे-अधुरे दिन में जाने ना दे।
कौन ठौर बैठी है जिन्दगी तु,
ठोकरे बहुत लगाती है।
रोज कसमकस तुझसे होती,
जग में तु भटकाती है।
कोई छोर मिला होता,
ठहर जाता मैं रुक जाता।
आसियाना अपना बनाकर,
सपनों का महल सजाता।
रह गया अटका ही,
जो भटका अपने सपने में।
ना आज मिला हकिकत सा,
कल का कोई ठौर नहीं।
कर्म की राह चला हूँ आज,
मेहनत जी तोङ है मेरी।
सुबह होती है ठिठुरन में,
रात अँधेरी आखरी पहर में।
रह जाता है मेहनताना रोज,
देता भी खुद ताने रोज।
वो घङी तेरी पुरानी इन जैसी है,
चल रहा काम क्या ये नकाफी है।
ख्वाहीशों से जीने का समय नहीं,
ये कर्म का पथ है अकेले का।
फल की इच्छा करने लगा है,
छोङ दे फिर निर्भर रहना।
आज मिला वो कल काम आयेगा,
कल की सोंच काम काम आयेगा।
जो समझते है मेहनताना देंगे ही,
ना समझ है वो मान लेंगे ही।
कौन तेरा जी का था जो छुट रहा,
साथ नहीं था जो अब रुठ गया।
भुल सब के बस कर्म करजा,
अकेला है भवसागर तर जा।
ये जस तेरा गाये ना गाये जग,
एक समय काल पुरा करना,
हर ऊँची निची राह चख,
हर दुख काम ही आयेगा।
सरल स्वभाव मधुर रस रह,
सारा जग जस गायेगा।
रह गया खुद में ही अकेला,
मगन अब खुद में हो जा।
सोंच ना कल की तु,
कल का ना कुछ काम सजा।
आज मिला है जिने को,
आज खुद में ही खो जा।।
-कवितारानी।
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