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क्यों / kyo

क्यों मैं तो सीधा जा रहा था पाने को मंजिल। मैं तो अकेला पा रहा पाने में मंजिल। फिर क्यों मुझे इस झमेले में डाला। हाय तुने मुझे फिर मार डाला। क्यों तुनें दिखाये सपने मुझे हसीन रातों के। क्यों गले लगाने को ललचाया। मैंने तो नहीं की कभी पाने की भी कोशिश। तुझे फिर क्यों तुने मुझे फंसाया। काली गहरी आँखों में धकेल दिया मुझे। दिखाकर प्यारी मुस्कान से घायल कर दिया मुझे। हाय अब क्यों अकेला छोङ दिया मुझे। अब क्यों करुँ किसी पर भरोसा जब विश्वास ही ना रहा किसी पर।। -कवितारानी।