दुर्दिन की याद / durdin ki yaad



दुर्दिन की याद


हट गयी थी जमीं पैरों तले,

आग लगी थी सीनें में,

निर्बुध्दी, निस्तेज जैसे औझल मैं,

हो गया था, घोर अँधेरा मन में,

सब ओर खाली-खाली था,

आँखों से बहता पानी था,

गालों पर छिल-छिल के निशान पङे,

आँखों में जैसे सुजन के अँगारे पङे,

कुछ समझ का आसार ना था,

जीने मरने का आभास ना था,

कुछ नहीं पाने को रहा, खोने को अहसास ना था.

लुुट गया पुर्ण रुप, मेरा मुझमें कुछ ना था,

लाल रक्त, जलधि बन ऊफान था हुआ,

निष्कंठ सुर नहीं भरता रहता मन,

सर्व सुन्दर चुभन करते,

अंदेशे हकिकत प्रमाण देते,

लगते चोट महा अवनध्य से,

कैसे ओर बखान करुं,

विश्वास का हुआ था ऐसे कत्ल और क्या कहुँ,

ना साँस रही ना आस रही,

कटती दिन-रात पहर रही,

याद अब बस ज्ञान रही,

वो दुर्दिन की बस याद रही,

बस याद रही।।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

झुठी यारियाँ | Jhuthi yariyan

नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

मुझे मुझमें रहने दो / mujhe mujhme rahne do