वो धुप मखमली / Vo dhup makhmali



वो धुप मखमली


श्वेत श्याम तारों वाली, आभा लिये थी मखमली।

मधुर गंध, निर्मल अंग, भा रही थी गोधुलि।

शीत शहर, हर पहर, ताक रहा, हर घङी।

पहर-पहर हर शहर खोजा ना मिली वो धुप मखमली।

छत पर मेरी आती जाती करती थी अठखैली।

लुक-छुप भाती पहर सुहाती करती थी नादानी।

भाती थी वो मन छाती थी, वो आती थी स्वप्न भरी।

नित निशा, भौर-प्रभा सी करती थी मन की बैचेनी।

ऊष्म ताप, मन संताप लिये करता रवि पहरी।

दिख जाये कही मिल जाये सुकुन भरी वो धुप मखमली।

आँगन वो मेरा, वो गलियारा वो चोबारा, वो ढेरा।

बीत गया पास पाकर उसको कितना मेरा सवेरा।

अब तक गर्म हुई संतोष भरी, अब दे गई जलन कई।

घाव गंभीर, मन में टिस, असंतोष से कट गई ये घङी।

रात अकेले, भीङ के मेले आह आ जाती शीत भरी।

ओज करते ,खोज बढ़ते देखते कही मिल जाये धुप मखमली।

चंचंल थी, कंचन थी, थी जब तक निहार दुर रही।

निकट आकर उग्र होकर विभत्स रुप दिखा गई।

अचरज मन, विभत्स तन आस भी ना कर रही।

कौन कहे दमित मन रोक रहा वो धुप मखमली।

कोई उपाय भुल जाये नव उमंग गाये मिल गई धुप मखमली।

कहीं पास आये दुख हर जाये आस ना पाये।

कि मिल आये के धुप मखमली, वो धुप मखमली।।


-कवितारानी।


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