संदेश

सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट / Suni part-11 Dharm Arth sankat

  सुनी भाग-11 धर्म-अर्थ संकंट घोर विपदा छाई, धर्म-अर्थ संकंट लाई, सब ओर उलाहना सहती, वो अब अकेले रहती। कहती कम गुम सी वो, काम करती रहती वो, बोलना चलना कम हुआ, अब जीवन एकाकी हुआ। समझ थी सबकी सोंच की, बात कहती पर पहले तोलती, मायुसी का मुखोटा ओढ़ा, जीवन को काम से जोङा। नये दोस्त बन गये, बच्चों मे घुल-मिल गये, पर मन में थी कुछ ठानी, कोटा जाकर नौकरी पानी। अर्थ का संकंट रोके था, धर्म का कांटा चुभ रहा, जैसे-जैसे अब चल रही, सुनी जिन्दगी कट रही। बोझ ना थी अहसास जगा, आत्मनिर्भरता का स्वाद चखा, रोज-रोज निमट कर जाना, खुद को कुछ काबिल बनाना। आसान ना थी पर झेल रही, सपनों को फिर बैग में मेल रही, कह रही खुश हूँ पर खुश कहाँ, अनसुनी मैं मेरी सुनी कहाँ। बच्चों में बच्ची बनती, स्टाॅफ से कुछ ही बनती, रोज अपने आप को संभालना, सुनना ना किसी की उलाहना। कुछ पैसे मिलते थे, अपने खर्चे चलते थे, घर से सारी मदद गई, अब वो भी कमाने लग गई। सुनकर जवाब चुप रहती, पर कुछ ना अब किसी कि सुनती, छोङ घर चली ही जाऊँगी, अगर किसी को बुरा पाऊँगी। खुद से लङती और कहती, चली ही जा क्यूँ सहती, पैसे वाले हैं खुश रखेंगे, तु कहे वैसे र...