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आज कुछ लिखने को जी चाहता है / aaj kuchh likhne ko jee chahta hai

  आज कुछ लिखने को जी चाहता है आज कुछ लिखने को जी चाहता है, दिल के अरमानों को पन्नों पर उतारने को जी चाहता है। आज इन बदलते हालातों में रोने को जी चाहता है, जो मिल ना सका दिल को वो बताने को जी चाहता है। आज हर कसक बताने को जी मचलना चाहता है, टुटते सपनों को स्याही से छापने को जी चाहता है। आज समाज के हर बंधंन को तोङने को जी चाहता है, जीया कहता है मुझसे कि ना डर इस समाज से। जी मुझे बेचैन करना चाहता है, धङकने अब दौङने लगी है। पल सारे भाग रहे हैं और समाज तेजी से बदल रहा है, ऐसे में घर पर रहकर खयालों मे जीने को जी चाहता है। जब दगा दे दोस्त और विश्वास टुट जाए आइने सा, ऐसे में हर दासतां को लिखना जी चाहता है। आज कङी मेहनत कर बुलंदी पाने को जी चाहता है, और बताना चाहता है इन बङबोलों को गद्दारी की सजा। आज फिर किसी गहरी आँखों में खोने को जी चाहता है, अपना एक सुन्दर आँसिया बनाने को जी चाहता है। जहाँ नहीं थे फासले दिलों के, ना था मैल किसी के, आज अकेले जीने को जी चाहता है।। -कवितारानी।