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चलता रहा मैं / chalta rha main

  चलता रहा मैं रफ्तार से चलते वक्त में बचा रहा अपना वजूद मैं, दोङते रिश्तों को संभाल रहा मैं, मिलते बिछङते बनते-बिगङते रिश्तों में खुद को संभाल रहा मैं। मन टुटता जब दोस्ती दगा देती, तब आँसुओं से भीगता मैं, चाह करता, राह तकता की कोई तो मना ले मुझे, हारता टुटता, रोता, गिरता फिर भी चलता मैं। रुकने को जी नहीं करता ना भागने को, ना हॅसने को चाहता, ना किसी को मिलने को, जब चाह होती रुसवा और दिल देता दगा तो अकेला रहता मैं। अपने होते खफा और दोस्त देते दगा फिर भी हॅसता मैं, मुश्किलों भरी दुनिया में दर्द भरे कांटे निकालता मैं, फिर पाने को मंजिल चल पङता उसी राह पर मैं। आसान नहीं जिंदगी का सफर पता हुआ है अब, जिसको समझे अपना खास होता वो जरुरत में ओर के पास होता, दिखती है दोस्ती बस बिकते हैं ख्वाब यहाँ, बिना दिखावे के लगता नहीं यहाँ कोई पास। मैल खाता नहीं सब का दिल अपने दिल से, तभी तो अकेले रहते हैं हम मुश्किल में, पुछता है क्यों होती सामाजिक, पारिवारिक बैंङियाँ जब, चाहुँ उङना अकेला आकाश में मैं, यही मैं मेरा है, मैं मैं का इसिलिए मन कहता कि, हर मैं है अपने आप में अकेला।। -कवितारानी।