सब स्वार्थी है / sab swarthi hai
सब स्वार्थी है सपने सजाये चल रहा था अपनी राह पर। साथ चाहता था अपने परिवार संग दोस्तों का, पर सबको यहाँ अपनी पङी है। जहाँ मतलब की झङी है, वहीं लाईन खङी है। मैंने भी उनको काँटा ना माना भावनाओं को बहा कर, चलता रहा मंजिल की ओर राह पर। कभी बेरी समाज ने डराया, कभी शराब का रहा साया। गद्दारी ने दिल तोङा तो कभी अपनों की जिद ने मरोङा। जहाँ तपती धुप सी पथरीली राह मिली। वही मिठी छुरी लिए कई कुवाँरी निगाहें खङी। जिस समय में ओर मेरी पढाई थी उसी समय ये निगाहें मुझे। डंसने आयी थी में भी पागल गीर पङा था मोह माया में। पर मंजिल की तस्वीर रोक रही थी वहाँ जाने से। जाल उन नैनों का ऐसा था सोंच ना सका और कह भी ना सका। बयां करुं किसे दर्द ऐसा जग उठा था। देखे बिन एक पल चैन नहीं मिलता। एक पल की नजर सालों सी छाप लगे। पर पाने को वो मंजिल दुर लगे, लगी कसक ऐसी की, ख्न्वाब अधुरे से लगे, ना हाल बयां किया ना मर्ज ठीक किया। अभी भी नैना के नैन बैचेन कर उठे।। -कवितारानी।