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फिर क्यों / Phir kyon

फिर क्यों  मैंने तो कभी ना कहा होगा, ना मैंने बताया होगा, फिर क्यों मुझे दी इतनी आशायें, जो हर कहीं अपनी मंजिल देख लेती है। सपनों को भी हकीकत समझ लेती है। क्यों मुझे दी इतनी दया, जो दुश्मन पर भी आ जाती है। अपनों को बार-बार माफ कर देती है। अनजान पर भी आ जाती है। क्यों मुझे दिया लगाव, प्रेम भाव, शर्म और अपनत्व, मैंने तो कभी ना मांगा था। मैंने तो ना कहा था की मुझे इतना सहनशील, अल्पतापी बनाओ। मैंने तो नहीं कहा था कि मुझे ऊँची व अलभ्य मंजिल के सपने दिखाओ। मैंने तो नहीं कहा था। फिर क्यो मुझे दिये ये, फिर क्यों मुझे दिया ये भाव, और ऐसा मन।। -कवितारानी।