सुनी भाग-14 प्रेम विरह / suni part-14 Prem Virah

सुनी भाग-14 प्रेम विरह


धीरे-धीरे ही सही,

प्रेम प्रकाश को खो रही,

दर्द के अब साये जागे,

रात भर दवा को वो रागे।


भुली अपनी बाल पीङा सारी,

काम पर जाती और गाती,

कब आयेगी काॅल उसका,

कब कहेगी है दोष उसका।


अब क्या जाने कौन दोष में,

पर सुनी दिखने लगी रोष में,

जोश अब सबको दिखता,

हर कोई कहता क्या हुआ, कुछ बदला दिखता।


कुछ नहीं हुआ कह देती,

 संभाल खुद को देती,

फिर घुम फिर कमरे में जाकर,

खुब रोती उसे याद कर।


रोज-रोज की तङप बङी,

मिलने बात करने की तलब बङी,

कहती सखी से अपनी सारी,

बाकि रहती जैसे मन की मारी।


मन की मन में रख कर,

कभी कहती नहीं उससे बात कर,

घुट-घुट कर इंतजार भी करती,

पर बात का कभी इंतजार ना करती।


अच्छे दोस्त, वो भी यही कहता,

शादी, घर वालों के हिसाब से कहता,

प्यार का अभी कोई किस्सा नहीं,

तुम हो फिर कोई मिला नहीं।


बातें ही थी याद आती रही,

सुनी के गमों को बढ़ाती रही,

रहना भी कभी-कभी मुश्किल हुआ,

सहेलियाँ भी मांग रही अब दुआ।


हाय विरहणी ऐसी थी,

बात करती पर हॅसती थी,

घंटो तक अकेले बैठा करती,

खोई हुई वो एक टुक देखा करती।


मधुरता के सारे आयाम अब,

खो गये कहीं जमाने में अब,

करियर की चिंता उसको थी,

समाज घर पर भी दबाव पीङा इसकी थी।


विरह दंश लिये मन में,

कहती रहती अपने मन में,

क्यों जीवन निराधार हुआ,

ना मिलना था तो क्यों प्यार हुआ।


आस लगाये बैठी रहती,

खोई सी रोती रहती,

अपने आप को उलझाती भी,

संभालती सुनी काम करती भी।


एक मौका पाकर काँचिंग गई,

मिलन ऋत आ गई,

खुशियों में फिर वो मस्त थी,

पढ़ती मिलती बात करती थी।


कुछ दिन कटे हँसी खुशी के,

फिर वो गया शहर छोङ करियर को,

पर अभी सब अच्छा सा,

बात करते सब अच्छा था।


प्यार का असर गहरा हुआ,

पर अर्थ-धर्म संकंट भी बढ़ा,

अङा रहा समाज अपने पर,

और सुनी को फिर भविष्य का डर हुआ।


पढ़ाई करती और आस भी,

समाज से ज्यादा खास कुछ और भी,

पीङा प्रेम की अपार रही,

इस समय वो बहुत सह रही।


कभी महिनें दो महीनें होते,

बात किये अब बहुत दिन होते,

पर काॅचिंग जाकर अपनापन पाना,

खुद को उलझा लेना।


आसान था पहले से सब,

पीङा बनी रहती थी बस,

पर समय साथ आदत होने लगी,

कभी गाने सुन कभी, घूम फिर मन लगाने लगी।


छोटी उम्र से सहती आई,

कुछ दिन में भूल सहती आई,

पर जवानी में ठोकर खाई,

प्रेम में भी पीङा हाय कैसी किस्मत पाई।


खुला मन अब शर्मीला ना था,

जो पास आये खुलकर अपनाता था,

नये दोस्त बनाये उसने अब,

खुब हँसते रहते सब।


बैठ अकेले जब वो पढ़ती,

जैसे पुरी दुनिया से लङती,

भारी मन भर आता था,

याद में खो जाता था।


मिन्नतें भी अब आम हुई,

हर शाम कहर हुई,

कब सुकुन आयेगा पुछती,

खुद से रुठती और मनाती।


इंतजार करती, कहती वही करे काॅल भी,

नम्बर थे पर करती ना वो कभी काॅल यों,

अपने अहम् को सबसे ऊपर रखती,

आत्मविश्वास को लेकर जगती।


करवट-करवट रात थी,

सुबह तङप से जागती,

दिन भर भीङ में अकेलापन रहता,

कोई क्या कहे समझ ना आता।


खुलकर लङना अब छा गया,

बेवजह चिढ़ना हो गया,

कोई ना बोलना उसके गुस्से के आगे,

सब चिढ़े मुँह से दुर भागे।


-कवितारानी।

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