कविता कहनी है / kavita kahani hai
कविता कहनी है
एक कविता लिखनी है मेरी खास सहेली के लिए।
यह बात बतानी है मेरी खास सहेली के लिए।
हाँ, ये सच है झुठ नहीं पर अब हम दोनों के बीच कुछ नहीं।
फिर भी ये बात लिखनी है मेरी खास सहेली के लिए।
बात ये खास है पुराने लम्हों के साथ है।
छोटे थे जब बचपन ये तो दोस्त थे अनजाने से।
आँखे उसकी कमल नयन, मृगनयनी सी।
मुस्कान ये उसके सारी दुनिया लुट जाए।
और बातें ये अलग है दोस्त हम अलग है।
जब अकेले में करते बात तो मन के भेद खोलते थे।
कुछ भी छिपा ना था हममें।
पर नजरिया समाज का अलग है।
डर है मुझे भी डर है उसे भी।
कौन आज सच्चाई पहचाने है।
कब किस बात पर रुठ जाए कोई ये बताए है।
सब कुछ अलग है, सब कुछ मिट गया है।
गलती ना उसकी है, गलती ना मेरी है।
संस्कार और समाज के झुठे भेद ने तोङ दिया प्यारा बंधंन ये।
ये उससे दुर हुँ वो मुझसे दुर है।
बात ये अनौखी है बात ये समाज की है जो समझता नहीं भावनायें।
जो चलाता सिर्फ अपनी हर नजदीकियों के ये अर्थ निकालता है।
हर बात का बतंगङ बनाता है ये कविता है मेरे साथ की।
एक कविता है ये मेरे अपनी सहेली के साथ की।।
-कवितारानी।
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