संदेश

मई, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं जिन्दा हूँ / main zinda hun

मैं जिन्दा हूँ अब आशाऐं भी क्या। जो तू नहीं साथ। अब सपने भी क्या। जो तू नहीं साथ।  अब वजूद ही क्या। जो तू नहीं पास। अब अपना भी कौन। जो तू नहीं साथ। अब रंग भी क्या। जो नहीं कोई पास। तेरा तुझसे जो बिछङा है। ये रवि बेरंग है। सात रंग छुपाये भी। पर धुप जलाये भी। साज नहीं सुर नहीं। जो गुण गान तेरा नहीं। अब बातों का रस खोया है। तेरा मैं जो जुदा है। अब कोई उम्मीद नहीं। जो पास तू नहीं। अब कोई इच्छा नहीं। जो तू साथ नहीं। कौन अब मन भाये। जो तु छोङ ना जाये। खुद से मैं अकेला हूँ। जब से तुझसे बिछङा हूँ। अपने आप में सिमटा हूँ। जबसे तुझसे बिछङा हूँ। खुद को व्यस्त रखता हूँ। जबसे तुझसे दुर हूँ। अब मैं बस जिन्दा हूँ। कुछ शर्मिंदा हूँ। आशाओं की खोज है। अब नीरस सब ओज है। अब बस साँसे है। और मैं जिन्दा हूँ।। -कवितारानी।

बैठा हूँ / baitha hun

  बैठा हूँ  कुछ भुले बिसरे लोगो में धाक जमाये बैठा हूँ। खुद से हारा बेसहारा मैं आग जलाये बैठा हूँ। अँगारों से खैलता आँखों में शोले सजाये बैठा हूँ। मन से हारा लकङहारा मैं शाख जमाये बैठा हूँ। वो आँख का तारा मन का मारा जग बिसरा बैठा है। खुद से हारा जग में प्यारा अपनी दुनिया सजाये बैठा है। तपती जमीन छोङ बर्फ में जलता हँसता वो खैलता है। खिलती जन्नत हॅसता वो अब सहारा सा लगता है। सोये सपने दूर अपने अपने जग को निहारता बैठा हूँ। मन में उमंग लेकर तरंग सब को माफ कर बैठा हूँ। नींद के मांदे रुप से आँधे आते जाते लोग देखता हूँ। अपनी जन्म भुमि से जुङा में अपना आज देखता हूँ। कुछ आशाओं संग, कुछ लेकर उमंग में साज सजाये बैठा हूँ। खुद को बुलंद करके अंग में राज राज छुपाये बैठा हूँ। संग सबका पाकर रंग अपना में बात बनाये बैठा हूँ। भुल दुख अपने लेकर जीवन सपने में आग लगाये बैठा हूँ।। -कवितारानी।

मैं अकेला आज / main aaj bhi akela

मैं अकेला आज मन में दबाये कई राज। आज भी अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ। खोज वही रोज है। आँखों में रोश है। मजबूर अपने सपनों से। मैं अकेला हूँ। आज भी अकेला हूँ।। आते जाते मिलते हैं। रोज नये रिश्ते खिलते हैं। रोज मिलते लोग बिछुङते है। कहते सुनते लङते हैं। अपने आप को छिपाये। अपने राज सबको बताये। मैं आशाओं का थैला हूँ। मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। किसे अपना कहूँ। किसे मानु खास मैं। रोज नये झंझंट है। लुटते लोग बाग। यही सारी परेशानी है। तभी मैंने ठानी है। मेरी मनमानी है। तभी मैं अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ। मैं आज भी अकेला हूँ।। -कवितारानी।

बस कुछ दिन की मजबुरी है / Bas kuchh din ki majboori hai

  बस कुछ दिन की मजबुरी है। अपनी किस्मत अपनी साँसें। बनते बिगङते रोज निभाते। चलती रहती अपनी बातें। होती रहती नई सौगातें। बस यही जिन्दगी और मजबुरी है। गुजरते दिन बैठोर जिन्दगी है। यादों की अब जीवन से दुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। यादों से बिसरा हो जाऊँगा। खुद से जुदा हो जाऊँगा। आऊँगा ना लौट यहाँ फिर मैं। अपनी दुनिया नई सजाऊँगा। खोज में रोज मुश्किलों की सुली है। देख रहा हूँ कल को मैं। बस कुछ दिन की मजबुरी है। ये कुछ दिन की मजबुरी है।। आज आँख से आँसु दुर है। घुटन सा जीया दुर है। मन की मनमानी दुर है। तन की मजबुरी दुर है। साँसों की टकराहट दुर है। जीवन एक सार सुरुर है। बस यही देख कहता है। बस कुछ दिन की मजबुरी है। बस कुछ दिन की मजबुरी है।। -कवितारानी।

मेरी छत से / meri chhat se

  मेरी छत से फिर एक शाम अकेले में, बैठा में निहार रहा। सोंच रहा देख रहा, यादों कि गालियों में घुम रहा। कहता कुछ आते जातो से, मिलता रोज मिलने वालों से। तिराहे का ये नजारा है, मन को मेरे प्यारा है। एक ठोर बन बैठा हूँ, बरसों से जमा बैठा हूँ। एक ताङ पुरब चढ़ गया, नीम छटी छटाई है। मेरी कुटिया टीन ओढ़ आई है, एक बगीया पङोसी की भी, एक कुटिया गरीब पङोसी की भी। सब कुछ बरसों से वैसा ही, कुछ ना बदला सब वैसा ही। देखा है बढ़ता अँधेरा, होती छाया, खोती काया। मेरी छत से, मेरी छत से।। पश्चिम ढलती लाली है, वो दिशा चुभने वाली है। अब खाली पङी जगह कोई, नई बनी है छत वही। कोई बैठा अक्सर देखा करता था। कुछ पल ही मैं मन हरता था। वो प्यारा आँख का तारा खोया है। याद आया वो मन रोया है। दुखी सी चार मीनारें दिखी। दिख पाया चेहरा कोई, पर मन को भाया ना चेहरा कोई। मुहॅ मोङ उत्तर पाया नयी छत, अब नया साया। माँ सी एक भोली छवि होती। हाल पुछती सब ठीक होगा कहती। यूँ ही दक्षिण सब छीपा सा। अब मन है खोया सा। फिर पुरब नजर करता मैं। मेरी छत से देखता मैं। ढुब गया आज का रवि। होगा सवेरा बात नई। मैं पश्चिम को गया पुरब में आया। थोङा ...

हवा शुष्क है, hava shushk hai

  हवा शुष्क है धुल भरी आँधिया, वादियाँ निराश है। तपती जमीन,  हवा शुष्क है, हवा शुष्क है।। है धरा धधक तेज, वेग में आवेश, रवि क्षितिज शांत है, फिर भी हवा शुष्क है। छांव घनी तेज है, पत्तों पर हर वेग है, शाँत सुकून आलोक है, पर हवा शुष्क है। गाँव गली विरानियाँ, खो गई कहानियाँ, आँखों में रोश है, हवा शुष्क है। साँझ शीतल आस है, हवा हो नम आभास है, आसमां में मेघ है, और हवा शुष्क है। ठोर-ठोर, ठहर-ठहर। पत्थरों को सहल-सहल, छु रही है ऊँगलियाँ, और हवा शुष्क है। डर है आंतक है, मन में कंपन है, तन में भय है, हवा शुष्क है। है खो गई वो फिजा, मस्त समां आसमां, खो गई चाह है, हवा जो शुष्क है। हर चेहरा रंग ओढ़ के, छाँव की खोज से, जा रहे अपने जहाँ, हवा शुष्क है। चल रही है जिन्दगी, अब यही है बन्दगी, अब यही है सुना, हवा शुष्क है। बीतने को है समा, खोने को है जहाँ, आने को है बर्खा, हवा अभी शुष्क है, हवा शुष्क है।। -कवितारानी।

शराबी कहर / sharabi kahar

  शराबी कहर वो शाम क्या शाम होती जब शराब की आँच ना होती। वो रात भी शाँत होती जब मदिरा आम ना होती। शुकून में कटते हैं दिन जब दिनों-दिन दारु ना होती। फिर मन सोंचता है फिर दिमाग में कोई हरकत होती। कि काश ये शराब ही नहीं होती। तो जी लेता बचपन हॅस खुस होकर। जी लेता मां और मम्मी मेरी अगर ये दारु ना होती। बचपन की हर उमंग नये पंखों के संग होती अगर शराब ना होती। ना दुख होता ना चिंता ना कोी कमी आर्थिकता की होती कमी। ना शर्म से आँखें नम होती ना आँखें नम होती। ना बेबस हम लाचार होते ना हम बेचार अँधियारे होते। ना तुमसे कुछ गीला होता ना रब से शिकायत होती। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। खुलकर जीते जिंदगी, जिंदगी की राह भी सुहानी होती। ना होता पथ भ्रम ना किसी से मदद की गुहार होती। मंजिल इतनी पास होती चमन होता आशियाना और महल अपना। अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती। मद के मद मे मदा है जो मर्द, नहीं उसे किसी की कद्र ना कोई हद। मद के मदिरे में मरी पङी है मदिर की मत। क्या करे मद का मारा जिसने समझ खुद को इसका आदि लिया। अगर बाप ही हो मदिर हो जाते हैं सब अधिर। बन बेचारा कट गया जीवन आगे क्...

रुकना हमें नहीं / Rukna hum nahi

  रुकना हमें नहीं धीरे-धीरे चलना अब हमें आता नहीं। रुकावटों से घबराना हम जानतें नहीं। आ जाए मुसीबत तो रुकेंगे नहीं। क्योंकि मुसीबतों से घबरा डरना हमनें सिखा नहीं। कर दृढ़ निश्चय बढ़ हम चलें हैं। हौंसलों को कर बुलंद फिर निकल पढ़े हैं। हो जाए तो हो जाए सामना कांटों या पत्थरों से। सुई संग मरहम लेकर हम चलें हैं। मंजिल को पाना ही अब लक्ष्य रहा हैं। नैतिक मुल्यों और धर्म को भी पाने अब निकल पढ़े हैं। कहा था राहगीर ने डगर ये आसान नहीं। पर आसान डगर पर चलना आता हमें भी नहीं। कहा किसी ने था कि जीवन अनमोल व दुख से भरा है। पर हमनें कभी सुख न मोल इसका किया नहीं। बस अब बहुत सुन लिया, बहुत कर लिया दुसरों का। अब मन का है करना और मन का बनकर ही है रहना। जहाँ खुबसुरत हमें बनाना। जीवन के स्वर्ण पथ पर है घुलमिल जाना। सुख वैभव साथ हमारे होगा। जब धर्म होगा ईश्वर होंगे तो होगा स्वर्ण संसार। आओ मिलकर करे सत्कार। ना हो इसमें अपनें ही इसमें सारा संसार। नमन करो ईश्वर को, और चल पढ़ कर जय-जयकार।। -कवितारानी।

मेरी मां / Meri Maa

  मेरी मां तुम ना हो जो साथ तो डर लगता है माँ, तुम ना हो जो पास तो घबराता है जीया माँ, ओ माँ... दिन तो जैसे-तैसे कटते डराती है रातें माँ। होती सुबह-सुबह जब नजर तुमको ही ढूँढे , ओ माँ... लगता है डर आ ना जाये शराबी पापा यहाँ। कांपता दिल जब सुनता कहर बरपा जो रहा। ढुँढती नजरे तुम्हें जब गम का होता आसरा पास यहाँ। चोहूँ रोना गोद में तुम्हारे जब रुकता ये काफिला, मेरी माँ... तुम ना हो जो पास तो जाऊँ किसके यहाँ। तुम ना हो जो साथ तो हाथ ना किसी का मिला माँ, ओ माँ... भाई दिया था तुने कि साथ मेरा होगा। दुख दर्द मैं वो सांत्वना देगा, पर कैसी थी किस्मत पाई। मेरी नहीं थी गलती फिर भी उसने लताङ लगाई थी। साथ होना था जिसे वो दूर तमाशबीन बनता गया। बची थी जो बाप के द्वारा थी कसर भाई पुरी करता गया माँ। ओ माँ... माँ... तुम ना हो जो साथ ये समाज ना अपना रहा। बेचारा, लाचार और मजबुर को करता गया, मां... ओ माँ... तुम ना हो जो साथ तो डर लगता है माँ... तुम ना हो जो पास घबराता जीया। ओ माँ, मेरी माँ... ओ माँ।। -कवितारानी।

बढ़े चलो / bade chalo

  बढ़े चलो गीत मेरे मन का आज जुबां पर आया। बढ़ाने कदम ख्वाब नये लाया है, ख्वाब नये लाया है। बढ़े चलो, बढ़े चलो डगर सुहानी करें चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो, काम मन के किये चलो। पत्थर आये जो राह मे तो हॅसकर उसे हटायेंगे। कांटो वाली राहों पर संभलकर चलते जायेंगे। हर मुश्किलों में होंसले अपने बुलंद करते जायेंगे। जो रुकावटें हो खङी तो हिम्मत से डटकर हटायेंगे। कर मन को राजी तन को साथी हम बढ़ते जायेंगे। हम बढ़ते जायेंगे। हम बढ़ते जायेंगे। बढ़े चलो, बढ़े चलो सपने पुरे करते चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो सबको खुश करते चलो। आज आजमाये तो वक्त तो हम नहीं घबरायेंगे। वक्त की रफ्तार से कदम हम मिलायेंगे। जो हो जाये तो देर तो हुंकार ना हम लगायेंगे। कर मन शाँत और तन शाँत फिर कदम उठायेंगे। रुकना नहीं थकना नहीं बस बढ़ना है बढ़ना है यही दोहरायेंगे। बढे चलो, बढ़े चलो वक्त की रफ्तार ले चलो। बढ़े चलो, बढ़े चलो समसामयिक होकर चलो। कर माटी को नमन, कर मां नमन , कर हौंसले बुलंद, बढ़े चलो। कर तन साफ, करमन साथ, चरित्र साफ लेकर चलो, बढ़े चलो। लेकर धर्म, संस्कृति, परंपरायें ईश्वर की राह चलो। लेकर देश का विकास और विकास खुद पर ...

माँ आपकी याद आती है / Maa Apki yaad aati hai

 माँ आपकी याद आती है सपने देखना ना जानता था जो दिखाए आपने। परायों और अपनों में भेद ना था जो जनाया आपने। खुद खङे होना ना जानता था पर दोङवाया आपने। अब क्यों रुसवा से दिख रहे हो। अब क्यों दूर लग रहे हो। जब पास आता हूँ आपके तो दूर जाते दिखते हो। जब दूर से देखता हूँ तो पास बुलाते दिखते हो। लोग जो सुनते हैं जो कहते हैं और पढ़ते है जीवन के बारे में। सब अनुभव करवाया आपने। दर्द, तङप, जोश, कर्म, रोग, आलस्य, लोभ, मद, मोह, डर, प्यार, झिझक, शर्म, मर्म, दुख, उल्लास, आनन्द सब बताया आपने। जीवन एक हिस्सा वानप्रस्थ हो जो शिक्षा संग इन अनुभव में बितवाया आपने। पर अब समय कम है, अब ग्रहस्थ आ रहा है, पर आधार भी नहीं बताया आपने। अब क्या होगा मेरा, अब कौन होगा मेरा। अब भी वैसी ही तङप से अनुभव से भरी होगी जिन्दगी। या जो सपने संजो लिए हैं वो पूरे करने को बढ़ पाऊँगा। कुछ राह बता, अब भी जरुरत है तेरी कुछ कर्म बता। कहीं भटक ना जाऊँ इस मृत्युलोक में तेरा द्वार बता। प्रभु तेरा द्वार बता।। -कवितारानी।

मन की आवाज लिखी / man ki aavaj likhi

मन की आवाज लिखी एक आवाज आज मन से उठी है। दबा रहा हूँ जो आज कलम पर आई है। कहने को सपना है पर मन खास अपना है। जग रुसवाई से डरता नहीं पर आन की फिक्र है जो अभी भी। अमानत की तरह है किसी की। आवाज स्याही कर आज जान दे दी मैंने। आवाज एक दीवाने दिल की है जो समाज में सीधा साधा है। दीवाना हर प्यारी नजर का जो पाना चाहे उन्हें हर नजर में। दीवाना हर अनौखे तर का जो अलग तरास है रब की। हर आवाज उसकी बहकाए मुझे उसकी जो खास पास होती एक समय। उसी की नजर नजारे दिखाए हर घङी। ख्वाब उसी के चलते रहते हैं जब भी अकेला होता हूँ। परवानगी, दीवानगी कई बार आई चरम पर। पर मेरा नहीं है सपना दीवाना होने का। उन नजरों में जो आकर्षण था गजब था। पर मन मेरा अजब था देखता था देखता खुब पर पास जाना नामंजुर था। कई बार जाति, धर्म भी लांगने को मन किया। कई बार हर निति-नियम तोङने को मन किया। पर सपना और मम्मी का कहा दिया ना माना। रुक जाता हर आखरी मोङ पर आकर। दबा देता उस आवाज को क्योंकि अभी कुछ ओर था बनना। ना दीवाना बना ना परवाना छोङ दिया वहाँ आना जाना। आवाज फिर सपनों कि आई और हर बार मैंने अपनी गाङी आगे बढ़ाई। खुलकर कभी किया नहीं सच वो जो ल...

जब किस्मत खराब / Jab Kismat ho Kharab

जब किस्मत खराब  कहते किस्मत खराब जब वक्त हो खराब। साथ नहीं देती तब सोला और शराब, तब कहता है मन, कैसी परिस्थिति है आई ना मन बस में ना तन। कहने को राज होता है तन का पर प्रधानमंत्री तो मन होता है। कैसी ये स्थिति आई ना खुद बस में ना जग बस में। खुद पर विश्वास करुँ तो जग साथ नहीं। जग पर विश्वास करुँ तो खुद हौंसला खो देता हूँ। कैसी ये विकट घङी है आई, ना अपनी चलती ना अपनों की। अपनी चलाऊँ सही मान तो अपने रोकते हैं। अपने चलाए गलत तो मैं चलने नहीं देता। कैसी ये घङी आई है, ना अब बस में ना कल बस में। अब वर्तमान को सभाँलु तो कल धुँधला भविष्य बनता दिखता है। और भविष्य को सुधारने चलुँ तो अभी स्थिति बिगङ जाती है। हाय कैसी किस्मत है पाई ना आत्मा बस में ना परमात्मा। आत्मा को संभालु तो परमात्मा दूर नजर आते हैं। और परमात्मा को मानुं तो आत्मा साथ नहीं देती है। कैसी मुश्किल स्थिति आई है ना बंधंन बंधा ना बंधंन वाले। बंधंन मजबुत करना चाहूँ तो बंधंन वाले दूर जाते हैं। बंधंन वालों को पास लाना चाहुँ तो बंधंन छकने लगता है। हाय कैसी घङी आई है ना चाह कर भी पास खङी रुसवाई है। ना अपना कोई आता नजर ना पराया कोई। अपने...

ख्वाब सच होते तो / Khavab sach hote to

ख्वाब सच होते तो देखा जो ख्वाब था हकीकत बन जाता। बनती दुनिया हसीन और भविष्य निखर जाता। तब गाता तेरे गुणगान बस भक्त महान बन जाता। बाँटता खुशियाँ लाखो और करोङो को हॅसाता। देखा था जो ख्वाब अगर सामने आता। बरस बीते-बीते लम्हे हजार। हर उतार-चढ़ाव ने निचोढ़ लिए मेरे हर ख्वाब। बिखरे टुकङे टुटे काँच सा बिखर रहा है ख्वाब। मन अब भी दोहराता है वही पिछङी बात। देखा जो ख्वाब था हकीकत बन जाता। तो ना होती जिन्दगी से रुसवाई ना तेरी निन्दा करवाता। रोज सोता और रोज तेरी पुजा करवाता। किस्से जो देखे महलों सा सजाता। आराम होता, मौज होता, होता आनन्द-उल्लास। देखता रहता राह नहीं पैर ना एक जगह जमाता। राह नई, मंजिल नई इस दुनिया को दिखलाता। ख्वाब जो हकीकत होता तो क्या-क्या ना होता। जो ख्वाब सच होता तो क्या ना होता।। -कवितारानी।

दो राहें / Do raahe

  दो राहें राहें कहीं खत्म नहीं होती, कहते हैं राहें खत्म नहीं होती। पर हर राह पर दो राहें आती रहती है। हर दो राह लक्ष्य को प्रभावित करती है। अब मानव हूँ समझ नहीं की सही है कौनसी और गलत कौनसी। कहते अच्छी दिखने वाली राह अच्छी नहीं होती। पर बुरी दिखने वाली की जिम्मेदारी भी कोई नहीं होती है। कहते हैं कठिन राह ही असली जीवन की राह होती है। वो अनुभव, त्याग, दर्द, समझ, ज्ञान से भरी होती है। और बुरी राह आराम, सुख और क्षणिक मौज देती है। फिर सुना की क्षणिक मतलब वर्तमान फिर सोंच की राह है। भुल-भुलैया है यहाँ इन राहों की एक सुलझाओ आगे फिर,  वही उलझन। तभी तो कहते हैं राहें खत्म नहीं होती, अन्त सिर्फ मौत है। और कुछ नहीं और चलते रहने वाला ही एक सही राहगीर है।। -कवितारानी।