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सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव / Suni part-17 Pratyaksh bhav

  सुनी भाग-17 प्रत्यक्ष भाव लिखते-लिखते उसके नाम पे, आ गये प्रत्यक्ष भाव पे, कौन-कहाँ किस मतलब से, समझ रहा अपने काम से। भौर समय जब कभी दर्शन था, जमीन पर निगाहें होती मुख तरसा था, कुछ दुख की मारी और सताई, नजर आई सुनी पुरवाई। अपने दुखों का भण्डार समेटे, मैं मिल रहा खुशी से दो घङी,  वो अपने आप की सताई सी, अपने साथी सखाओं में उलझी थी। धीरे-धीरे दिन बीते, महिनें भर में खास साथी छुटे, स्वार्थ कहे या कहे आत्मरक्षा ही, पर सनी उसके साथ ना थी। अचरज सबको मुझे भी था, खास साथी का उससे काम ना हुआ, अधिकार दुसरे साथी ने पुरे किये, जब सुनी सी.एल. पर थी जीये। ये कैसी छवि उसकी दिखी, पर नौकरी ही थी खास कमी दिखी, भावनाओं की बाढ़ पैरासुट में थी, साथी से ज्यादा परवाह खुद की थी। कौन कहेगा विश्वासी रही, अचरज नहीं जो सुनी स्वार्थी कही, पर मुझे खुशी थी साथी बिछुङन की, अब मेरी ही सुनी अकङन थी। कुछ दिन महिनें ही लगे, घुले और आगे बढ़े, मैं जहाँ अपने आप का मारा, वो भी हुई थी अब बेसहारा। पैरासुट ने साफ मना कर दिया, शादी होगी उसकी अब बात टाल गया, साथी राम-राम कह गया, अब मैं ही रह गया। कुछ खास कोशिस ना की, उसम...