नया सवेरा / naya savera

नया सवेरा


सुबह तो रोज होती है पर आज कुछ अलग है,

अलग है सोंच आज की अलग है विचार आज के।

अलग फिर नजरिया है, अलग फिर मौसम है,

कल जो खास थे आज हम उनसे नाराज है।

कल जिन्हें देख कर सुबह सुहानी मानते थे,

आज देखने को कभी उनको जी नहीं करता।

कल जिनके हम नगमें, किस्से गुनगुनाया करते थे,

आज उनके विचारों, ख्वाबों से भी परहेज करते है।

कल जिनसे मन की बात खुलकर करते थे,

आज उन्हीं की शक्ल तक देखना नहीं चाहते थे।

तभी तो मन बैचेन है भ्रमित कर रहा तन ये,

उलझन में समझाये खुद को ये।

कह रहा है ये की आज की सुबह नई है,

हालात नये है, नयी है रोशनी, नयी है वादियाँ।

नये ख्वाब है, उमंग भी ताजा है, ताजा है सपने,

फिर क्यों तुम्हें मनाऊँ जब गलती मेरी नहीं है।

फिर क्यों ना जीऊँ इस नयी रोशनी में,

जो मुझे चमकाने आई है, चाहुँ भुलना भुत को में।

क्योंकि आज सुबह सुहानी है।।


-कवितारानी।

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