ऐ आसमां झुक जा जरा / e aasman jhuk ja jara
ऐ आसमां झुक जा जरा
मेरा मुझमें रहा क्या।
जो भीङ में रहूँ अकेला मैं।
मेरा मुझमें रहा क्या।
जो अँधेरे में घुटता रहूँ मैं।।
ऐ आसमां जरा झुक भी जा।
नमी से तर हो जाऊँ मैं।।
सुखा पङा है उपवन मेरा।
बंसत सुनहरी पाऊँ मैं।।
मेरी जमीन दरारों भरी।
रेत की आँधियाँ ही बन जाऊँ मैं।।
ऐ आसमां झुक जा जरा।
अनन्त सा खो जाऊँ मैं।।
तु भी खुब मजे करता है।
दुर खङा मुझे तकता है।।
कहना नहीं तुझसे कुछ ।
चादर मुझपे बन जा जरा।।
मेरा मुझमें रहा नहीं।
जो भीङ में रहूँ अकेला मैं।।
पुरा भी होना पाऊँगा।
रह गया अधुरा मैं।।
पाकर जो खोया है।
मुझे अब बचा नहीं है।
ऐ आसमां झुक जरा।
बह जाऊँ खुलकर मैं।।
अन्तर्मन भी अकेला है।
आसमां में कही ढेरा है।।
तारों संग यारी है।
सबकी अपनी बारी है।।
तपन शीत अँधेरा घना।
मैं खुद में बचा कहाँ।।
फुल बगीया महक रहा।
खुशबु खुद को आती कहाँ।।
बह रहा हूँ नदियाँ सा।
प्यास खुदकी बुझती कहाँ।
चमक चाँदनी खुब है।
पर चाँद है अँधेरे का यहाँ।।
तपन हूँ रवि की मैं।
पर ढण्डक मुझमें है कहाँ।।
उङ रहा ठोर-ठोर जग में मैं।
बेठोर हूँ भाता कुछ कहाँ।
जाऊँ जहाँ लौट आता हूँ।।
लहर हूँ जलधि नदी कहाँ।
ऐ आसमां जरा झुक जा।।
बाँध लु अपनी सीमायें यहाँ।
ऐ आसमां झुक जा जरा।
रोक लुँ खुद को में आ।।
-कवितारानी।

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