भविष्य का राही / bhavishya ka rahi

 भविष्य का राही


मन में कोई डर है भविष्य की डगर है,

डगमगाये ना ये पल-पल इसी का डर है।

आ रहे हर वक्त झोंके लग रही है ठोकर,

पल-पल बहक रहा मन न स्थिर रहा।

समय ना ठहर रहा हर पल निकल रहा,

निकले पल कि यादों मे आज मन बहक रहा।

भविष्य का अभाव है पथ भी भ्रमित रहा,

चल रहा नाविक बन दिशा का भी ज्ञान नहीं।

नहीं रहा कोई हौंसला ना साहस की बात है,

पथ विचलित मन विचलित तन का ना आस रहा।

ना आस रहा भु लोक का कोई, आकाश का पता कहाँ,

फिर भी छुने की उम्मीद में मंजिल को ढुँढ रहा।

रहा ना कोई साथ यहाँ ना कोई बतला रहा,

जाना है कहाँ मन खुद से ही पुँछ रहा।

अनजाना रास्ता है अनजानी मंजिल,

जाना कहाँ पता नहीं फिर चला जा रहा।

ईश्वर का साथ था पर मृत्यु लोक का राही था,

वक्त था कलयुगी मानव थे सब दुखी।

दुखी दुख मे जो कर्म किया वही उसे डरा रहा,

आज बनके राही मैं मानव जगमगा रहा।

क्या पता पहुँचेगा या नहीं बस अपनी धुन में जा रहा,

एक राही अकेला जा रहा।।


-कवितारानी।


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