कहानी देवा की / kahani deva ki

कहानी देवा की


अजब-गजब करता है कारनामें,

अजब-गजब उसके किस्से कारनामें।

सुनता नहीं किसी की बात,

करता वही जो मन को आवे रास।

सुनाता हूँ मैं कहानी एक पनवाने की,

नहीं है जो किसी का गैर ऐसा दोस्त देवा।

बातें रहती उसकी बङी-बङी,

जिन्दगी रहती अधिकतर सपनों में पङी।

अजब-अनौखे उसके खयाल ऐसा है ये रामदयाल,

बात सुनों बचपन की जिसमें केवल पङाई ही उसके अङचन थी।

करना दुनिया में ऐश इसीलिए बैंच डाली किताबें शेष,

घरवालों ने लगाई फटकार पर कहा पङे इनकों-

इनको कोई फर्क मेरे यार।

बच्चों संग खैलना हर वक्त मौज-मस्ती से गुजर रहा था कि आ पङी इन पर गाज,

माता-पिता ने छोङ दिया साथ।

पर चलती रहती दुनिया दारी,

मत तो केवल इनकी ही थी मारी।

कमाने की उम्र हो चली पर खेलने से मन ही ना भरे,

जोश-जोश में गये कमानें, दो दिन की कङी मेहनत।

तिसरे दिन घर पर की लङाई ये काम भी इनको रास ना आया,

शौक लगा गाये लाने का सपना बुना तबेला बनाने का,

एक की दो और दो की चार करेंगे।

दुध, दही, घी से अमीर बनेंगे पर सपने कहाँ सच होते उधार कर लाया गायें,

इनकी भरपाई छठे दिन गायें रही ताक हाट,

क्योंकि अब जरुरत थी मोबाईल लाने की।

दो दिन ना चला दुध का व्यापार क्योंकि अगले दिन रहता फिर नया सपना,

ऐसे थे ये शौक मिजाज हमारे गाँव के देवा साब।

मोबाईल का था हर युवा में क्रेज,

इनके भी था चायना का सेट।

गाने सुनना, घुमन, फिरना शौक ये मिजाज,

पर खत्म हुए पैसे तो पागल वो एक हजार में बैंच आया मोबाईल सेट।

पुछो ना कि क्या था मेरी टोक का जवाब,

हम है शौक मिजाज, आते जाते है मोबाईल मेरे यार।

देख इनके मिजाज सब कहते क्या पागल है या दान-धर्म का चलाया व्यापार,

अब नयी दुनिया थी बसानी खेती कर आजीविका कमानी।

दीदी ने दिया खैतों का जिम्मा तो रुचि,

लेकर लाया बीज मौसम बेमौसम क्या देखना,

बीज ही तो है सब ऊगेंगे ही, सोंच हर तरह का लिया बीज कुछ नहीं तो घर पर पङे रहेंगे।

मैंने हाँ ही, ठीक समझी, मेरी आपत्ति पर नहीं दिया ध्यान।

डाल दिया एक ही पेटी में सारे बीज बेल तो है,

सब ऊगेगी सोंच चला ट्रेक्टर खैत में अब।

अब तो इंतजार था मक्का का या किसी भी प्रकार की सब्जी का।

कुछ समझ नहीं आया, क्या हुआ उसने फिर बैल लाने का प्लान बनाया।

दो बैल लाया रिश्तेदारों से पैसे उनके,

क्या गाङी के भी नहीं दिए थे, थोङे दिन का था शौक अब क्या खिलाए,

चरा दिए खैतों में सालाना फसल का किया सौदा रोज थोङा शौक था होता रहता।

फसल हुई नाश बची ना अब कुछ आस, ऐसी खैती कोई करे मेरे यार, ये सब कर सकता दिनेश मेरा यार।

किस्सा अब जवानी का चल रहा था तो होनी ही थी शादी घर वालों की राय में यही थी सबसे अच्छी जिम्मेदारी।

पर अभी तो ये बालक ही था जवानी का कच्चा खिलाङी ही था।

करता दिन रात फोन पर बात दीदी के रहती थी जो लङकी पास।

कर्ज हूआ दुगुना जब भी जाना बङे शहर लाना कपङे चाहे हो क्यों ना उधार,

घर वालों ने ठान लिया बंधंन में इसे बांध दिया।

अब था जीवन का नया पहलु,

जीवन जीना बीना उसके कही ना था,

दीदी की थी उसके यही गलती छोङा नहीं उसकों अकेले।

बचाकर जिम्मेदारी से उसे रखा।

अपने पास कर्ज का बोझ कार्ड के पैसे खैती, मुनाफे से किया वसुल और कराया अपने यहाँ,

रख कर उस पर सुरुर।

पर पंछी को जब बाहर निकालेंगे तो कोशिश तो होगी उङने की कई बार उङा वो और आया।

अपने गाँव पर हिटलर दीदी ने उसे किया,

अपने साथ फिर वो अकेले ही आया गाँव।

और बङा भारी करनामा किया उसने शरेआम।

संगत थी उसकी बदली दोस्त डकैत साथ।

उसने उसको किया वश में बुरी आदतों के साथ,

सिगरेट, दारु, तम्बाकु अब थी आम बात,

उसने कि बङी चोरी मिलकर उनके साथ,

पकङा गया वो ओर गाङी लाया दहेज सामान से,

वो भी आछी अब।

सब तरफ थी बदनामी गुमनामी थी।

जीवन अब बुरी संगत में उसने बेंच दी।

दहेज की बाइक लाया एक कार हर्श और घमंड भरा था उसकी आँखो में ईर्ष्या तो,

और बङे गई जा रहा था मौज में लेकर अपनी,

फुटी किस्मत सोंच इसी से करुँगा व्यापार।

पर हर थोङी दुरी पर पहीया छोङता उसका साथ।

गाङी की उसी दुश्मन के नाम और पैसे किये फिर उधार, 

गाङी गयी और लाङी भी अब जब भी आता शराब पीता जीवन का ना कोई बताता।

पर सपने अभी भी थे उसके साथ उसकी दीदी के रहता अभी।

पास आता कभी तो करता वही बङी-बङी फैकी।

बात दुर रहकर देखता में और कहता उसको दुर रह मेरे यार।

इसीलिये कहते कि सपने वही देखो जो पुरा कर सको,

और धाम वही करो जो निति संगत व विचार पुर्ण हो।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अरी तुम भूल गई, Ari tum bhul gyi

मैं...कब / Main kab

वैचारिक मतभेद / vecharik matabhed