खोई- खोई राह / Raah hai khoi Khoi

खोई- खोई राह


चलते-चलते फिर रुक गया हूँ।

जाना चाहता हूँ कहीं पर जाऊँ कहाँ।

हर जगह जला रही है चिंता।

हर मार्ग पर है दो राहें।

उलझन में है जिंदगी इसे सुलझाँऊ कहाँ।

कोई दाँये बताता कोई बताता बायें।

जाने को है एक मंजिल को पर दुसरा जाता कहाँ।

राह में है अङचने कई।

कई बेङियाँ है जकङी हुई।

सब कदम रखुँ सोंचकर पर सोचुँ कब कहाँ।

अब तो मंजिल पास आ रही।

पर में देख नहीं पा रहा।

चलते-चलते फिर रुक गया हूँ।

क्योंकि जाना चाहता हूं कहीं पर जाऊँ कहाँ।

सोंच रहा हुुँ अब तो अजब है तेरे खैल।

तेरे खैल ना समझा कोई, बता मुझको मेरी।

राह है जो खोई-खोई।।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

झुठी यारियाँ | Jhuthi yariyan

तुम याद आते हो। (tum yad ate ho )