सुनी भाग-8 शिक्षक प्रशिक्षण / suni part-8 shikshak prashikshan
सुनी भाग-8 शिक्षक प्रशिक्षण
अपने ओज और अपने गुण,
मिले जो शब्द उनको बुन,
लिखी ये कहानी जो है बुनी,
अब एक मोङ पर आयी सुनी।
एक बार मे ही ब्रेक किया,
प्रथम प्रवेशिका परख पास किया,
पुरी पढ़ाई करके लक्ष्य पर अब,
शिक्षक प्रशिक्षण महाविध्यालय में अब।
वही सीमित संसाधन थे,
पर अब बहिन भाई के पास साधन थे,
पैसे की कोई कमी ना रही,
अच्छे मन से वो रोज काॅलेज गई।
नव योवन सुंदर मुख,
श्वेत रंग रोचक सुख,
काया से बलिष्ठ ऊँची थी,
सुनी मन की पर पुरी खिली थी।
साङी की पौशाक शाक पर,
दिखती अब बहुत धाक पर,
कुछ अहं यहीं से जन्मा था,
जब सबसे कुछ अच्छा सुना था।
सुनेपन की अब परवाह नहीं,
व्यस्त जीवन अब परवाह नहीं,
गाँव शहर से संपर्क टुटा,
रोज काॅलेज से नाता जुङा।
अप टु डेट रहना था,
मस्त लग रही सबका कहना था,
पढ़ाई में सबसे आगे थी,
कुछ खुशी मन की जन्मी थी।
चर्चाओं का यहाँ बाजार गर्म हुआ,
नैनों से मन नर्म हुआ,
देख एक अनजाने को,
अपनापन पनपा उसे पाने को।
नया परिवेश नई उमंग थी,
रोज देख-देख चाहत दंग थी,
एक अहसास प्यार सा हुआ,
संभाला बहुत पर असर हुआ।
ध्यान कर अपना बचपन,
कुछ कङवे किस्से और भदा मन,
जीवन डगर भविष्य की दिखी,
मन को पसीज नजरें किताब पर टिकी।
रोज पढ़ना और रोज लिखना,
खाली समय में मस्ती करना,
कमरे पर सहेलियाँ सारी,
जीवन की व्यस्तता लगी प्यारी।
कुछ बोझ पैसों का आता,
कभी-कभार मन पसीज जाता,
अब फोन दे दिया जब भाई ने,
बात होती रोज घर पे।
ध्यान पखना पढ़ाई करना,
बुरे लोगों से दुर ही रहना,
नाक हमारी ऊँची रखना,
सुनी सुनाई रोज ही सुनना।
कभी छेङना और छिङाना,
रोज-रोज नये बहाने बनाना,
डर से और झिझक से लङते,
रोज काॅलेज यादगार करते।
लम्हें सहेज पढ़ते रहे,
दिन महिनें गुजरते गये,
कभी कभार गाँव भी जाती,
अब सुनी हॅसती गाती।
सारा दुख जैसे दुर हुआ,
पुरे जोश उल्लास में युवा,
ओज गुण उसपे भारी था,
नव योवन भी उसपे हावी था।
छोङ परवाह यही से बढ़ी,
कुछ छुट देकर हामी भरी,
सहेली से जाहीर करती,
हाँ मैं भी पेरासुट से प्यार करती।
कभी समझाया कभी माना,
साथ पढ़कर बात करना,
पर पढ़ाई पर ही ध्यान लगाना,
घर की सोंच छोङ दिया जाना।
दबे मन अब कम बात की,
पर छेङती सखियाँ और बात की,
खुलकर मस्ती और मौज हुए,
जब पास बैठकर पेरासुट जीये।
इजहार नहीं पर फोन पर बात होती,
दोनों ओर इजहार रहा बाकी,
मिलना-लङना और हॅसी,
सुनी यहाँ से प्रेम जाल में थी फॅसी।
घर की सोंच डाटती भी,
रुठ जाने पर मानती भी थी,
अहसास ना होने देती प्यार का,
दोस्त खास हो वो यही मानता।
अपनी होंशियारी यहीं से पाई,
झुठ बोलना यहीं से थी सिख पाई,
घर पर अब बहाने बनते,
छुट्टी पर पिकनिक पर भी जाते थे।
सबसे दुर विश्वास पर रही,
मर्यादा को बनाये रख रही,
पर बंधीशों पर बांध ना थे,
अब जीवन में आराम से काम ना थे।
परीक्षा समय सब छोङ दिया,
क्या पता कितनों का मुख मोङ दिया,
पर अपने अहम् में खुब पढ़ी,
पास हुई बी. एड. और एक सीढ़ी ओर चढ़ी।
सफर जीवन अनुभव छोङ गया,
मधुरता के रोचक पल जोङ गया,
नया आनंद अब खयालों सा,
सब अपने मुकाम, कुछ जीवन अब सवालों सा।
ज्ञान अपार शिक्षण में पाया,
आत्मनिर्भर रहना प्रशिक्षण ने सिखाया,
गुरु ज्ञान में प्रवीण अब,
सब कहने लगे नवीन अब।
विध्यालय विध्यार्थी सबसे मिले,
अध्याय बनाके अध्यापक गीने,
रोज-रोज के लेसन सारे,
याद आते दिन वे सारे।
सुबह का जल्दी नाश्ता होता,
भुखे पेट लंच को रोता,
शाम को फिर लिखते रहना,
साल भर लेसन, मोडल ड्रेस कहना।
आखरी लेसन भी आ गया,
एग्जाम बीता सन्नाटा छा गया,
गमगीन विदाई कुछ सुनी थी,
युवा जीवन की अब कहनी थी।
रोजगार सफर तय करना,
प्रशिक्षित बेरोजगार ही कहना,
निर्भरता के एक सोपान चढ़ी,
सुनी किस्मत से फिर लङी।
अब जग का अनुभव ज्ञान था,
हर सवाल पर प्रबल जवाब था,
निर्भरता के कुछ और बल छुटे,
सुने ना किसी की जो वो रुठे।
पैक किया सामान अब जाना है,
वापस गाँव घर में आना है,
अपने अलग कमरे कि ही दुनिया,
फिर सुनी होने लगी वो मुनिया।
कुछ डर वर का भी आने लगा,
कुछ प्रेम आनंद का विरह छाने लगा,
कुछ रोज की व्यस्तता चुभ रही,
एक अच्छा जीवन वो धुन में सुन रही।
आगे का प्लान बनाने लगी,
मन ही मन बेरोजगारी सताने लगी,
मन्नतें रोज अब रब से थी,
अकेले में फिर सुनी रोती थी।
अपना कमरा और कुछ यादें,
अच्छी चलने लगी थी रातें,
बात करती दोस्तों से लंबी,
मन में रखती मन की बंधी।।
-कवितारानी।
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