बैचेन मन / bechen man
बैचेन मन
आज एक बैचेनी सी छायी मन पर,
क्यों तङप सहा मन मेरा।
कहीं लगाना चाहूँ जीया तो लगता नहीं कहीं,
क्यों घबरा रहा मन मेरा।
बतलाना चाहूँ दर्द ये अपना किसी को,
क्यों कोई मिलता नहीं ऐसा मुझे।
लग रहा है ऐसे जैसे इस पल छुट रही दुनिया पिछे,
क्यों लग रहा कि अब प्राण निकल जायेंगे मेरे।
जैसे गंभीर था अनजाने में किसी के बारे में,
और अब जा रहा छोङ मेरी दुनिया।
क्यों यह अहसास निचोङ रहा मन मेरा,
ऐसे पहले हुआ नहीं कभी और ना होगा शायद कभी।
क्यों मन रोकने पर भी सोंच रहा तेरी।
आज हुआ ये मेरे साथ जब हम दोनों के बीच कुछ नहीं,
तभी एक मन रोक रहा ना मिलने को तुझे।
पर इसमें मेरी तो खता कुछ नहीं।।
-कवितारानी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें