कोई पुछे / koi puchhe
कोई पुछे
कितने दर्द है इस दुनिया मैं कोई मुझसे पुछे।
दुख किसे कहते हैं कोई मेरी रग से पुछे।
दर्द होता है और आँखे बरसाती नदिया बन बहती है।
कराहना चाहता है गला पर आवाज कैद होती है।
दहशत में हर लम्हा हर घङी मन बैचेन रहता है।
जब थोङी आवाज से ही दिल घबरा जाता है।
फिर पुछे कोई मन से कि दर्द क्या होता है।
जब सुख देने वाला पालनहार ही दुख दाता होता है।
जिस के आसियाने में रहे वो ही राक्षस शैतान खुनी होता है।
उसकी नजरों से नजरें चुरा जिने में जो मर्ज होता है।
इस हालात में कोई पुछे की दर्द क्या होता है तो कैसे ये बयां होता है।
एक किरण आस की चाहे मन चाहे कि खुशी कहीं दिखे आस-पास।
चाहे मन की किसी को करे दर्द बयाँ।
पर कोई नहीं आस-पास होता है जिसे बतायें वही राक्षस मित्र होता है।
तब पुछ मुझसे की दहशत में जिने से क्या होता है।
रोके मन बहने से नीर इन आँखों से रोके गले को आवाज करने से।
चहरे से कहे की हँसता दिख नहीं तो समाज बुझदिल कहेगा।
पर उधर पाजी राक्षस कोङे मारे तो नीर अधीर हो बता देता सब है।
तब पुछ मन से की दुख क्या होता है।
मैं पुछता हूँ मन से की क्या होता तेरा बात वक्त मानता नहीं ।
ना मानता नीर आँखों का दुख देते वो थकता नहीं और ठहरता नहीं फिर।
कब तक बताऊँ की दर्द क्या होता है दुख कैसा होता है।
-कवितारानी।
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