सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव / suni part-10 parivarik dabav

सुनी भाग-10 पारिवारीक दबाव


सबकी प्यारी लाङली वो,

हॅसती, हॅसाती, रुलाती वो,

मन में रखती नहीं कुछ भी हो,

कह देती जो भी सुनी हो।


बाल जीवन आनंदित था बिताया,

सामाजिक कंलक ने जहर थमाया,

घर वालों का साथ भी मिला,

पर मन में रही मन की गीला।


शिकवे कई, शिकायतें कई,

पर हरदम उसे मौज रही,

किसी का जोर चलने ना देती,

मुहॅ फट थी सब कह देती।


मोहल्ले की वो रानी थी,

स्कुल में हर दम मनमानी की,

काॅलेज में किसी की चलने ना दी,

घर पर उसकी चलती ना थी।


बस लाङ प्यार का सहारा,

जहाँ हारे वहीं आँसुओं की धारा,

जैसे-तैसे कर बित गई उमर बचपन की,

अब पढ़ाई पुरी कर बात हुई जवानी की।


ओने-पोने दे आने के लोग,

छिंटा कसी कर देते रोज,

रोज-रोज के बहानों की धुनी,

अब पारिवारिक दबाव में सुनी।


सारी कोशिशों से हारे वो,

चली नहीं कहीं चलाई जो,

लङका रहा नोंवी फैल,

लङकी एम. एस. सी. कर ली तो।


अब बैमेल रिश्ता भी कहते,

लोग टोंट कसते रहते,

सुन-सुन के वर वोले ताव में,

सुनी को ले आये पारिवारिक दबाव में।


अबकी बार चाल चले,

घर ना चुनकर समाज चुनें,

बुलाई बैठक अपनी वधु चाहने को,

आरोपित किया पिता समाज बिगाङने को।


सम्मानित सदस्य समझाते रहे,

पिता अपनी और घर की गाते रहे,

सनी के ना जाने की जिद थी,

पर संबंध समाज की रीत थी।


कुछ समझे, कुछ समझाये,

बाकि तमासे देखे और भङकाये,

पुंछ के बताने को बोला फिर,

आखिर समाज से बाहर होने का डर सिर।


समझाने मनाने की बात मानी,

वधु पिता ने अपनी पगङी संभाली,

कुछ ने हरजाना देने की सलाह दी,

दुजा खुंट तलाशने की सलाह दी।


शादीशुदा एक दाग थामा,

अपनी बिटिया और समाज अनजाना,

घोर गलती की बहकावे में तब,

समझ आया बाल विवाह अभिशाप अब।


घर जाकर बोला सुनी से,

कान खोलकर सुन ले,

अब मुझे किसी की नहीं सुननी,

तेरी जितनी सुननी थी सुन ली।


जल्दी से सामान बांध दो,

जाने के रिवाज मांग लो,

अब इसे भेजना पङेगा,

कौन जीवन भर इतना सुनेगा।


सुन बोल पिता के सहमी सुनी,

बोली भी क्युँ आपने इतनी सुनी,

बोल देते नहीं भेजना मुझे मेरी बेटी,

दे देंगे हरजाना चाहे दुजा वह ना हो।


पिता ने डाटा और समझाया,

बङा परिवार मैंने इतना नहीं कमाया,

फिर कौन तुझसे करेगा शादी,

यहाँ रहना सबकी बर्बादी।


फिर बोली रोती-रोती,

मैं कमा लुंगी अपनी रोजी-रोटी,

चली जाऊँगी गाँव छोङ,

पर नहीं जाऊँगी उस छोङ।


अब तक ना माना अब कैसे मानु,

नहीं जमता, ना पढ़ा कुछ, वर कैसे मानु,

उसमें मुझ जैसा कुछ है नहीं,

मैं उसके लिये बनी ही नहीं।


कुछ दिन यही रोज का होना,

कभी माँ का कभी बहिन का रोना,

भाई की कोशिशें बेकार थी,

सुनी अब लाचार थी।


फिर से हिम्मत थाम के,

रीट की भर्ती की जान के,

तैयारी करने की बोली वो,

और स्कुल जाने की बोली वो।


बार-बार रट लगा बैठी,

आखिर थी वो लाङ की बेटी,

फिर से उसकी मान ली,

किताबें थमा पढ़ाई जान ली।


अभी समय धीमा था,

कुछ कम हुई चर्चा भी,

स्कुल जाकर कुछ कमाने लगी,

रीट के लिए पैसे जुटाने लगी।


बैठ अकेले रोती थी,

दोस्तों को खोजती थी,

एक मन का मीत खो गया,

एक आजाद मन फिर रो दिया।


अब कुछ व्यस्त सी हुई,

सुनी अनसुनी जी रही,

चलने लगा खुद का खर्च अब,

पढ़ रही थी सुनी फिर अब।


-कवितारानी।

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