सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता / suni part-12 sangharsh, rojgar, aatmnirbharta

 सुनी भाग-12 संघर्ष, रोजगार, आत्मनिर्भरता


समय सार कई बातें थी,

आत्मनिर्भरता की रातें थी,

सुख चैन कुछ खोया सा,

मायुस मन था रोया सा।


आत्मनिर्भरता का ऐसा साया,

मनोबल पर कहर बरपाया,

आया संघर्ष रोजगार बनकर,

छाया जहर भविष्य पर।


हर कोई अपना ज्ञान बताये,

ऊँचे शिखर पर चढ़ाये,

तो कभी गहरी खाई में ले जाये,

बैरी मन भी तो कुछ ना भाये।


सहमा से वहमा सा मन लेकर,

अंहकार सा गर्व, कुछ तन लेकर,

अपने रोजगार को निर्भरता के रुप लगाया,

तभी आगे बढ़ने का होंसला आया,


दिन भर कर्म पथ पर बढ़ कर,

शाम घर खेत घुम कर,

रात-रात भर पढ़ना रहा,

सरकारी बनने का जुनून बढ़ता रहा।


खुद जाकर या भेजकर के किसी को,

हर पाठ पढ़ा नौकरी पाने को,

हार ना मानी घर समाज से तो,

हार कैसे मानें वो खुद से यों।


खुलती ना आँखें नींदो से भरी जो,

लगती ना आँख सपनों से भरी जो,

कठोर तप है अगर तो मुझे करना,

हो कोई बाधा पर मुझे लङना।


शाम सवेरे और समय निकाला,

चित्तौढ़ के गौरव को मन उतारा,

साहस का थाम दामन वो,

पढ़ रही थी आत्मनिर्भर होने को।


उलाहना का अब फर्क नहीं,

उल्टे बोल को सुल्टाती वहीं,

कहती बस अब फिर मन की,

चलने किसी की देती नहीं।


दबे मन में सपने लेकर,

हॅसी बाँटती वो खुलकर,

आकांक्षाओं से परे रहती,

मन को साफ रख खुलकर कहती।


तंज सुन-सुन घर के सारे,

कब तक रखोगे अपने सारे,

जवान छोरी घर नहीं भाती,

क्या बिटिया की मन में नी आती।


खुलकर घर के उसे सुनाते,

मन जानकर रुक भी जाते,

उसके बोल स्पष्ट रहते,

जान उसे फिर कुछ ना कहते।


चार पैसे इकठ्ठे हुए,

कपङे लाकर भावनाओं में बङे,

सबको कुछ दिलाना चाहे,

बच्चों के खिलौने लाये।


फिर से सोंचती कल की बारी,

कोटा काॅचिंग में जाने को ना कही,

सोंच समझ खर्च करना,

सिख रही मन मारना।


अब फैसले उसके चलते,

सब बङे-बुढ़े उससे पुंछते,

कुछ समझते, कुछ समझाते,

पर उसके आगे हार मान जाते।


कुछ भोली, कुछ प्यारी थी,

आशाओं पर खरी वो न्यारी थी,

समझदारी खुब भरी पङी थी कहती,

नादानी उस पर भारी थी।


एक बार की सभा हुई,

समाज के बङे-बुढ़ों में राय हुई,

भेज दे सुनी को ससुराल में अब,

यही भला होगा समाज में अब।


पिता ने पुत्री पर छोङा, 

वो जाने तो ही कुछ हो ये उसका फोङा,

हमारी उसपे अब नहीं चलती,

घर छोङने-मरने की बातें करती।

कुछ ने समझाया, कुछ ने आरोप मङा,

बहानों से बचने का साधन जङा,

सुन ये उसे ही बुलाया गया,

पुंछ लो जो पुछना हो, कह ला खङा किया।


सवालों को सुनते ही बोल पङी,

जैसे रानी लक्ष्मी तलवार तान खङी,

अपने तर्कों की उसने ला दी झङी,

हार मानते दिखे अब उनमें आपस में तङी।


नैतिकता निजता का सवाल रहा,

लङकी की मर्यादा, इच्छाओं का ध्यान रहा,

नहीं पसंद तो झगङा दे दो,

कुछ ने नयी युक्ति को गढ़ा।


कुछ कहा नहीं बस दे देंगे बोली,

और मुँह पर सुना बुरा चल पढ़ी,

गयी अपने शयन कक्ष पर वो,

और खो गई फिर अपने कक्ष पर वो।


किस्मत को कोसती और रोती,

कभी जागती कभी सोती,

दिन-दिन कर महिनें बीते,

जीवन संघर्ष को सुनी सींचे।


नौकरी की जीद् थी अङी,

पर किस्मत में ना थी पङी,

एक-एक कर परीक्षाऐं भी दी,

फैल होकर हान मानती सी कह पङी।


कब तक संघर्ष आम होगा,

मेरे जीवन दुखों का विराम होगा,

कब खुशहाली मेरे आँगन आयेगी,

ये दुर्दिन की घङियाँ कब जायेगी।


-कवितारानी।


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