सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन / suni part-13 Prem Sambandh
सुनी भाग-13 प्रेम बंधंन
हवाओं के खिलाफ,
अदाओं के लिहाफ,
अब जब नव उमंग थी,
सुनी सुनाई एक तरंग थी।
रोज का काॅलेज जाना रहा,
अनचाहे कुछ बदला रहा,
जो अहसास नहीं था पहले कभी,
वो साहस अब मन करने लगा।
विध्यालय, महाविध्यालय अपने आप को रोक था,
आये बहुत पाने को पर खुद को टोका था,
पर वश कहाँ चलता चलाने से भी,
ये दंश चुभता है वक्त आने पर ही।
जहाँ सुनापन रोज-रोज की टिस थी,
ना सुनने-समझाने वालों पर रीस थी.
आये दिन के दबाव से जो खीज थी,
अब नयी लहर से ये मन की सींच थी।
रोका बहुत फिर भी हो गया,
टोका बहुत पर मन खो गया,
वो बातें अनचाहे चाहने लगी,
अब प्रेम बंधंन में सुनी बंधने लगी।
इजहार ना था, ना प्यार सा,
पर आकर्षक था अनुमान सा,
कुछ अच्छा सा लगने लगा,
किसी को देख मन खुश रहने लगा।
ऐसा हुआ ना था पहले कभी,
मन ही मन संतोष को जन्म देने लगी,
शाँति सी खुशहाली बन छवि दिखी,
अब मन की बात कवि बन लिखी।
किससे कहती सुनी बात को,
आखिर साथ थी कही उसी को,
समझाया कुछ-कुछ छेङा उसने,
हर बार बात को फेरा उसने।
मौका मिला साथ रहने-घुमने का,
विश्वास बढ़ा पास-पास रहने का,
जीवन से आधार लेने लगा,
अब सब कुछ बस प्यार में रहने लगा।
बात बस मन तक थी,
शर्म हया और बंधंन में थी,
खुलकर ना उसने कुछ कहा,
इजहार सुनी ने कभी ना किया।
ऊँची कद काठी थी,
मुझे शक्ल सुरत भाति थी,
देखना-सुनना सुकून देने लगा,
प्यार-प्यार मन कहने लगा।
जब रोज का उससे मिलना था,
जीवन रस का खिलना था,
सब कुछ ही जैसे था पा लिया,
जीवन के सारे गमों को ही मिटा लिया।
कुछ डर था भविष्य का की लोटी थी,
खुलकर बिगङने से खुद ही टोकी थी,
अच्छे अंक लेकर काॅलेज से विदा हुई,
पर मार्कशीट संग प्रेम गीत ले गई।
कभी-कभी ही मिलना रहता था,
प्रेम अधुरा सा लगता था,
बातें होने लगी लम्बीं-लम्बीं भी,
पर इजहार हुा नहीं अभी भी।
सुनी उसे ही दिल दे बैठी थी,
सुबह शाम उसमें खोई रहती थी,
कहती कभी, कभी खीजती थी,
मिलें कैसे बहाने खोजा करती थी।
कुछ समय ही निकला जीवन का,
प्रेम रस में ढुबी आजीविका,
काम जाना और आना,
दिन भर का हाल प्रेमी को सुनाना।
अपनी ही मनवाती थी,
भाव भी बहुत खाती थी,
इसी पर लङाई होती थी,
पर खुद ही अक्सर मनाती थी।
जिद पर ज्यादा रहती थी,
उसी को दोष देती थी,
साथ रहके बहुत था जाना वो,
जीवन को कुछ पहचाना वो।
पहचान जाना भाव क्या,
सुनी के जीवन का आधार क्या,
उसे अपने केरियर की पङी,
सुस्त जीवन ढोर सुनी अपने पर अङी।
शिकवे करती शिकायत करती,
बैठ सहेली से कहा करती,
क्या मैं करुँ, कैसे कहुँ,
कैसे उसे ही पा लुँ मैं, जीवन साथ बिताऊँ मैं।
क्यों होता है प्यार ये।
क्यों ना मिलता इजहार ये।
क्यों ना मन चाहे वैसा हो।
क्यों प्यार दोनों में बराबर हो।
मैं रुठुँ रोज मनाये वो,
पास बैठे और सताये वो,
मेरी हर मांग पुरी करे,
क्यों ना हो रहा चाहूँ ये।
हाँ कर-कर सहेलियाँ थकी,
कुछ दुर हटी, कुछ काम में बटीं,
रही एक ही खास फिर,
सुनती समझाती रहती वो।
करियर पर पैरासुट छा चुका,
तुझे भी उङान भरनी है,
बात हो रही वो चलने दे,
पर अपना ध्यान पढ़ाई पर दे।
प्यार और समाज में बंट रही अपने आप में,
सोंच रही जाऊँ कहाँ,
दर्द ले लिया है बहुत बढ़ा,
औस मन भी यहाँ था अङा हुआ।।
-कवितारानी।
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