सुनी भाग-16 दोस्ताना / Suni part-16 Dostana / Friendly
सुनी भाग-16 दोस्ताना
मन की विरानियाँ आम थी,
खुशियाँ मिलती दुखों के दाम थी,
एक तराजु जैसे जोङा था,
जीवन में निराशा का फोङा था।
रह सह आ जाती थी,
प्रेम पीङा छा जाती थी,
कहती कहाँ क्या चल रहा,
अपने मन में वो मल रहा।
महिनें दो महिनें में बात होती,
बीच के समय याद में रोती,
अब काम के सिवा आराम था,
आराम में मन में वो राम था।
कमियाँ ना उनमें ना इसमें थी,
दोनों की अलग-अलग किस्में थी,
किस्मत का साथ ऐसा ही,
सोंच दुर हो रही जैसे ही।
कौन अकेला रह पाया,
जीवन दुख सह पाया,
कल का बीता वापस ना आता,
मन का उतरा फिर ना छाता।
कुछ समय बाद ही,
एक सहयोगी मिला साथ भी,
हर कदम पर पास रहा,
काम में भी आराम रहा।
धीरे-धीरे घुलने लगे,
विध्यालय के बाहर भी मिलने लगे,
सब जान गये दोस्त काम के,
इनके रिश्ते हैं बस नाम के।
सुनी का खालीपन दूर हुआ,
विवाहित साथी का नुंर हुआ,
अपने मन के बोझ से,
उठ रही थी अब ओज से।
रोज-रोज अब मौज थी,
साथी की जैसे खोज थी,
खुब मस्ती की बातें थी,
रोज बन रही यादें थी।
साफ रंग और सुन्दर काया,
बोली में मिठास और माया,
औहदे का रुतबा इतना ना था,
चरित्र में उसके जितना दम था।
अनायास सब खींच आते,
पास जाकर घुल जाते,
बुरा कोई ना मानता था,
उसके मिजाज को हर कोई जानता था।
प्यार नहीं पर प्यार सा बंधंन बना,
सुनेपन में से संबंध घना,
हर किसी की नजर ऐश पर,
सुनी जुङी बस कैश पर।
रोज की तारीफें सुनती थी,
कुछ सपने गहरे बुनती थी,
कभी-कभी खो जाया करती वो,
जमीन देख रो जाती वो।
गाँव शहर सब जानने लगे,
सुनी व्याख्याता हो मानने लगे,
दो साल थे होने को,
उससे पहले ही कुछ हुआ यों।
वो वन वाले प्रिंसिपल से लङ लिये,
और फाईल जाॅब की माँग रहे,
अविवाहित बताने का मुद्दा,
ले गये कोर्ट नौकरी छुङाने को।
कुछ घबराई, कुछ रोई थी,
सुनी अपने डर में खोई थी,
आगे क्या होगा कौन जाने,
पर घर स्टाॅफ को साथ मानें।
खुब रोई घबराई वो,
साथी सखाओं ने हिम्मत बढ़ाई यों,
कहा सब ठीक होगा,
सबुत नहीं शादी के क्या ही प्रुव होगा।
जला केस जो रीट लगाई,
प्रिंसिपल ने दुरी बनाई,
पर जीत सच की राह पर थी,
शादी की कोई तस्वीर ना थी।
महिनें चार महिने बीते,
सब धरे रहे, रहे रीते,
कुछ ना होना जाना था,
कुवांरा बैठा वर भी उसे सुनी ले जाना था।
सुनी के अब रिश्ते आते,
सबको वो रिझाते,
पर सुनी के भाव भारी थे,
वर मिले अपनी शर्तों पर ही कहने थे।
घर परिवार का साथ मिला,
समाज से भी नहीं अब कोई गीला,
सब हिल मिल कर रहा करते थे,
हर बात शेयर किया करते थे।
आये दिन एक लङके कि बातें,
सुनी को देख सब माके झांके,
आदर्श थी आखिर सबकी वो,
सेलिब्रिटी बनी सुनी की यों।
त्योहारों में भी रोनक थी,
कोई परेशानी ना ज्यादा हुई,
साथी का साथ में आना,
लगने लगा सुनी को सयाना।
हर बात को वो शेयर करता,
सुनी पर वो बहुत मस्ता,
सुनी भी सब कहती,
अब घंटो उनकी बातें चलती।
कुछ भुला बिसरा सा ही था,
पैराशुट अब भी याद था,
आहत करने को काॅल किया,
शादी करेगा जल्दी बोल दिया।
टुट ही गयी सुनकर के,
खुब रोई बिछुङकर के,
साथी का साथ भी ना कर पाया,
कोई उस सा ना हर पाया।
सुबह से शाम तक,
जो करे काॅल लगे बात पर,
स्कूल में भी व्यस्त हुई,
जीवन एक कुटीर हुई।
संभालती समझाती खुद को,
वैसे भी कब होना था वर वो,
सारी बातें बेकार थी,
बस यहीं तक ये याद थी।
आखिर ये स्टाॅफ काम आया,
कैस से हिम्मत यहाँ बन हम साया,
एक साथी और जुङा,
उसपे भी मन था मुङा।
सखी सहेलियाँ उसे चुनती,
छेङती कुछ-कुछ बेलती,
पर सुनी सब जानती थी,
अपना समय बिताती थी।
दिन, महिनें, साल गुजरे,
परिवीक्षा काल पुरा होने को है,
उसके साथ ही वो खुश है,
विध्यालय में सब ठीक है।
रोज का जाना और आना,
जीवन जीने का बहाना,
किसी से कोई उम्मीद नहीं,
जीवन जीना भी आसान नहीं।
सबकी सुनती अपनी चुनती,
साथी प्यार घर किसी की नी सुनती,
कंजुसी भी घर कर रही,
अब कल के लिये इकठ्ठे कर रही।
वो होशियार अब समझदार भी,
अच्छा मोबाईल है और पद भार भी,
सबसे मस्त मगन वो रहती,
किसी से मन का भार ना कहती।
अच्छे दोस्तों का साथ था,
केस का भी हुआ समाधान था,
अब कोई चुने उसे अपनी नारी,
जीवन की ये चुनौती थी भारी।
-कवितारानी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें