सुनी भाग-18 उपसंहार / suni part-18 The Conclusion

 सुनी भाग-18 उपसंहार


ये कहानी थी बाल विवाह की,

नहीं ये कहानी थी एक लङकी की,

नहीं ये कहानी थी सफलता की,

नहीं ये कहानी थी समाज के आईने की।


नाम चाहे दो कुछ,

इसका विस्तार चाहे दो कुछ,

पर है ये मर्म एक जान का,

ये भाव था एक छुपी हुई जान का।


जब काल का काम आता है,

सब रिश्तों नातो को से खा जाता है,

जब बुरा समय भाग्य में होता है,

तो कोई कुछ नहीं कर पाता है।


पर जो किया दृढ़ संकल्प तो,

काल को भी मानना पङता है,

जब जपा नाम भगवान का तो,

बुरे समय को भी जाना पङता है।


जो सुनी जकङी थी समाज में,

उसने समाज को झुका दिया,

जो सुनी थी अनजान दुनिया से,

उसने दुनिया को दिखा दिया।


वो नारी बन के आई,

उसने अपने मन की कर दिखाई है,

लक्ष्य साधा अपना खुद ने,

जिद से ही व्याख्याता बन दिखाई है।


पर मन की पीङा तो मन ही जाने,

जो घाव पङे मन पर वो कौन जाने,

तन को सवाँर वो लेती है,

पर यादों में बंधी वो रहती है।


है जोर जग का और बंधंन है तन का,

उसपर विजय पानी है,

यह तो आधी ही कहानी है,

अंतिम मुकाम तक हिम्मत उसे दिखानी है।


हम कामना करे भावी भाग्य की,

जो हार रहे हिम्मत उन सबकी,

सिख जो दे रही सुनी या नहीं आपने,

सुनी की कहानी सुनों आप भी।


ये समय का जोर ज्यादा नहीं है,

आपने अपना लक्ष्य पाया कि नहीं है,

ना पाया तो कुछ कर दिखाओ आप भी,

हिम्मत टुटे तो सुनी को याद करो आप भी।


-कवितारानी।


उम्मीद है आपको हमारी ये कहानी पंसद आयी होगी। हमारा किसी प्रकार से किसी को दुख पहुँचाने का यहाँ कोई औचित्य नहीं रहा, फिर भी किसी को किसी बात का बुरा लगा हो तो हम बिना शर्त माफी मांगते हैं। आगे भी हमारी कोशिश रहेगी की हम आपके लिये नये-नये लेख कहानियाँ लेकर आये।

समाज का मार्गदर्शन करने वाली नये भावों को आपके सामने रखें। हमारी सारी कविताएँ और लेख कहीं से लिये हुए नहीं होते हैं इसलिए हमें प्रेरित करें और इन्हें शेयर करें। इनको मुल रुप में ही आपको पहुँचाया गया है।

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