सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर / Suni part-9 Post graduation

 सुनी भाग-9 स्नातकोत्तर


पास होती गई वो ग्वाली,

मस्त रहती थी वो बावली,

शिक्षक प्रशिक्षण भी हो गया,

अब घर पर पहरा हो गया।


खुब मौज में फिर लौट आई,

रोज शाम को वो दोस्त पाई,

बातें अब मोबाइल पर थी,

सुनी अब सबसे खुश थी।


विद्वानों का सामर्थ्य मिला,

पथ पदर्शन और घर का साथ मिला,

सबकी तारिफें सुन परिवार खुश,

आगे भी पढ़ना है चाहे हो दुख।


कुछ समझाया कुछ माना,

घर वालों ने उसे जाना,

स्नातकोत्तर में फिर प्रवेश लिया,

निरंतर अध्ययन को पुरा किया।


फिर से रोज पढ़ना था,

काॅलेज लाइफ में जीना था,

खुशी के लम्हें सज रहे,

सुनी को पीपंल खिल रहे।


जिक्र नहीं ना देखा वर को,

बालपन में बांधा जीवन को,

एक बार काॅल आया भी,

कुछ सुनी को भरमाया भी।


साफ शब्दों में दो टुक कहा,

मैंने कभी तुम्हें अपना ना कहा,

साधो अपने जीवन पथ को तुम,

मुझसे रहना हमेशा दुर तुम।


फिर ना दुबारा काॅल हुआ,

नम्बर ही बदला जो मन में बवाल हुआ।

कहती रही सखियों में सब,

जीवन की रही सलाखें जब।


नव उमंग परवान थी,

सुनी अब रसमय खान थी,

अपनी मर्यादा में बंध कर ही,

प्रेम पढ़ाई कर रही थी।


काॅचिंग जाना काॅलेज जाना,

संस्कारों में पहने वस्त्र दिखाना,

खुलके सबको हॅसना हॅसाना,

जीवन कठिनाईयों का भुल जाना।


सरस सौम्य ये काल चला,

पर घर पर कुछ बवाल चला,

फिर बात गरमाई सी,

ससुराल से खबर आई थी।


ध्यान दिये बिना पढ़ती रही,

ले जाने की सोंच से चिढ़ती रही,

आये दिन फोन पर बहस करना,

बहिन-जीजा से भी लङना।


दबाव तनाव तुफान था,

पर दोस्तों का अब घना जाल था,

एक प्रेम प्रकाश मे उलझी थी,

सुनी अब कुछ सुलझी थी।


गमों को छोङ किताब पकङी,

घर जाने पर कुछ अकङी,

छुट गया फिर से पहरा,

परीक्षा आई वो गम गहरा।


दोस्त प्यार सब भुल गई,

किताबें अब दुनिया बन गई,

जी जान से पढ़ाई की,

पास हुई प्रथम वर्ष फिर बढ़ाई थी।


गाँव जाकर वही सुनना,

जीवन भर के किस्से बुनना,

सोंच के बंधे सारे प्यारे,

रोज-रोज उम्र के ताने मारे।


शादी ब्याह का मौसम होता,

गर्मियों मे किसी के काम ना होता,

बैठ बाहर पटलाई थी,

बातों मे सुनी मुखिया थी।


सामने किसी कि हिम्मत ना,

पिछे से आती बातें भाती ना,

पर अटल वो अपने कथन पर,

नहीं पसंद मुझे वो वचन वर।


अभिमानी पागल बनी,

गाँव की वो कहानी बनी,

लोग अब इशारे करते,

पर सुनी के मन पर असर ना करते।


ब्याह त्योहार घर तक रहती,

और समय पढ़ाई करती,

परिवार के अलावा जाना ना था,

उसको किसी ने पहचाना ना था।


आये संदेशे फेर दिये,

पिता ने अब कुछ जवाब ना दिये,

हर जगह उन्होंने किरकिरी की,

पर सटीक जवाब से अब बात थी।


हमारी बेटी पढ़ी लिखी,

नहीं भेंजेंगे सबको दिखी,

बातों में अब जोर था,

समाज की मर्यादा का शौर था।


अभी बस शीत युध्द सा,

चल रहा सब कोशिशों सा,

ये अब भेजने के मन से नहीं,

वे अब बस ले जाने के मन से ही।


काॅलेज खुले सुनी गई अंतिम वर्ष को,

एम.एससी अब उसकी थी होने को,

सब भुल वो पढ़ती रही,

अब भी मस्त थी पढ़ती रही।


मन थामने को दोस्त थे,

तन की पीङा वो सह लेती थी,

पैसे भी अब कम ना थे,

पिता कुछ ज्यादा कहते ना थे।


माँ भी अच्छे से पढ़ने को कहती,

बहिने पैरों पर खङे होने को कहती,

भाई का संभल साथ था,

दोस्त हमेशा मन के पास था।


फार्म निकलते जब भी कोई,

वो ध्यान देती जैसे पुरी खोई,

हर परीक्षा में अब भाग लेती,

इस बार पास होगी यह कहती।


हर बार रह जाती थी,

पर फिर से ऊर्जा पाती थी,

कुछ साहस साथ के देते,

कुछ बुरे दिन आगे कर देते।


किताबों का खर्चा बढ़ गया,

फार्म का भी अब भार बढ़ रहा,

परीक्षा केन्द्र पर दुर तक जाना,

नये संघर्ष का बना पैमाना।


मेहनत करती और पढ़ती थी,

घर वालों की अब उम्मीद थी,

कुछ भी बने पर निर्भर हो,

अब सुनी आत्मनिर्भर हो।


स्नातकोत्तर की परीक्षा पास हुई,

अब खशियाँ थी पढ़ाई पुरी,

लक्ष्य पुरा अब नौकरी पाना रहा,

पर तभी घर पर जाना पर रहा।


पिता ने खर्चा बंद किया,

घर पर काम करने को कहा,

अबके लेने आयेंगे ते भेज भी देंगे,

पर अब यहाँ ना रहने देंगे।


कुछ टुटी कुछ सहमी सी,

बंद कमरे में रही खोई सी,

कौन सहारा किसे अपना कहूँ,

जीवन सफर में ऐसे कैसे जीऊँ।


दृढ संकल्प फिर रब से मांगा,

नौकरी लगना ही होगा मन में ठाना,

रोज-रोज कोचिंग की भी कहती,

और दोस्तों से पुछा करती।


पढ़ाई करके शिक्षित थी,

नौकरी के लिये अब लक्षित थी,

एक साथ और मिलना था,

जीवन का सफर आगे बढ़ना था।।


-कवितारानी।

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