हवा शुष्क है, hava shushk hai
हवा शुष्क है
धुल भरी आँधिया,
वादियाँ निराश है।
तपती जमीन,
हवा शुष्क है,
हवा शुष्क है।।
है धरा धधक तेज,
वेग में आवेश,
रवि क्षितिज शांत है,
फिर भी हवा शुष्क है।
छांव घनी तेज है,
पत्तों पर हर वेग है,
शाँत सुकून आलोक है,
पर हवा शुष्क है।
गाँव गली विरानियाँ,
खो गई कहानियाँ,
आँखों में रोश है,
हवा शुष्क है।
साँझ शीतल आस है,
हवा हो नम आभास है,
आसमां में मेघ है,
और हवा शुष्क है।
ठोर-ठोर, ठहर-ठहर।
पत्थरों को सहल-सहल,
छु रही है ऊँगलियाँ,
और हवा शुष्क है।
डर है आंतक है,
मन में कंपन है,
तन में भय है,
हवा शुष्क है।
है खो गई वो फिजा,
मस्त समां आसमां,
खो गई चाह है,
हवा जो शुष्क है।
हर चेहरा रंग ओढ़ के,
छाँव की खोज से,
जा रहे अपने जहाँ,
हवा शुष्क है।
चल रही है जिन्दगी,
अब यही है बन्दगी,
अब यही है सुना,
हवा शुष्क है।
बीतने को है समा,
खोने को है जहाँ,
आने को है बर्खा,
हवा अभी शुष्क है,
हवा शुष्क है।।
-कवितारानी।
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