रुकना हमें नहीं / Rukna hum nahi

 रुकना हमें नहीं


धीरे-धीरे चलना अब हमें आता नहीं।

रुकावटों से घबराना हम जानतें नहीं।

आ जाए मुसीबत तो रुकेंगे नहीं।

क्योंकि मुसीबतों से घबरा डरना हमनें सिखा नहीं।

कर दृढ़ निश्चय बढ़ हम चलें हैं।

हौंसलों को कर बुलंद फिर निकल पढ़े हैं।

हो जाए तो हो जाए सामना कांटों या पत्थरों से।

सुई संग मरहम लेकर हम चलें हैं।

मंजिल को पाना ही अब लक्ष्य रहा हैं।

नैतिक मुल्यों और धर्म को भी पाने अब निकल पढ़े हैं।

कहा था राहगीर ने डगर ये आसान नहीं।

पर आसान डगर पर चलना आता हमें भी नहीं।

कहा किसी ने था कि जीवन अनमोल व दुख से भरा है।

पर हमनें कभी सुख न मोल इसका किया नहीं।

बस अब बहुत सुन लिया, बहुत कर लिया दुसरों का।

अब मन का है करना और मन का बनकर ही है रहना।

जहाँ खुबसुरत हमें बनाना।

जीवन के स्वर्ण पथ पर है घुलमिल जाना।

सुख वैभव साथ हमारे होगा।

जब धर्म होगा ईश्वर होंगे तो होगा स्वर्ण संसार।

आओ मिलकर करे सत्कार।

ना हो इसमें अपनें ही इसमें सारा संसार।

नमन करो ईश्वर को, और चल पढ़ कर जय-जयकार।।


-कवितारानी।

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