शराबी कहर / sharabi kahar
शराबी कहर
वो शाम क्या शाम होती जब शराब की आँच ना होती।
वो रात भी शाँत होती जब मदिरा आम ना होती।
शुकून में कटते हैं दिन जब दिनों-दिन दारु ना होती।
फिर मन सोंचता है फिर दिमाग में कोई हरकत होती।
कि काश ये शराब ही नहीं होती।
तो जी लेता बचपन हॅस खुस होकर।
जी लेता मां और मम्मी मेरी अगर ये दारु ना होती।
बचपन की हर उमंग नये पंखों के संग होती अगर शराब ना होती।
ना दुख होता ना चिंता ना कोी कमी आर्थिकता की होती कमी।
ना शर्म से आँखें नम होती ना आँखें नम होती।
ना बेबस हम लाचार होते ना हम बेचार अँधियारे होते।
ना तुमसे कुछ गीला होता ना रब से शिकायत होती।
अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती।
खुलकर जीते जिंदगी, जिंदगी की राह भी सुहानी होती।
ना होता पथ भ्रम ना किसी से मदद की गुहार होती।
मंजिल इतनी पास होती चमन होता आशियाना और महल अपना।
अगर ये शराब ना होती, अगर ये शराब ना होती।
मद के मद मे मदा है जो मर्द, नहीं उसे किसी की कद्र ना कोई हद।
मद के मदिरे में मरी पङी है मदिर की मत।
क्या करे मद का मारा जिसने समझ खुद को इसका आदि लिया।
अगर बाप ही हो मदिर हो जाते हैं सब अधिर।
बन बेचारा कट गया जीवन आगे क्या कौन जाने।
बन लाचार आया रब के द्वारा दो मुक्ति इस मद से राम, हे राम, जय राम।
बिन तुम्हारे नहीं आस अब, ना सरकार, ना सरोकार।
विनती करता में लाचार है घनश्याम, मेरे राम, मेरे श्याम।।
-कवितारानी।
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