सुनी भाग-7 महाविध्यालय/ suni part-7 college life

 सुनी भाग-7

महाविध्यालय


थी जिद की आगे बढ़ना,

बस इसी मुद्दे पर नहीं लङना,

किस्मत का कुछ साथ रहा,

जीवन महाविध्यालय में आगे बढ़ा।


अब साझँ छोङ भौर को पाई,

गाँव से निकल वो मुस्कुराई,

शहरी जीवन के साथ बढ़ी,

मन लगाकर खुब पङी।


साथ अब परिवार था,

पापा का कुछ खयाल था,

संभाल के अपने योवन को,

काॅलेज जाती वो पढ़ने को।


विज्ञान संकाय से अध्ययनरत्,

अपनी मस्ती में रहती मस्त,

सहेलियों के साथ घुमना-फिरना,

सादा जीवन उच्च विचार रखना।


अपने बनाये नियमों पर चलती,

किराये के मकान मे रहा करती,

गाँव के वो मालिक पढे़ लिखे,

बेटी सी रखते घुले-मिले।


खर्चे को मिलते सीमित पैसे,

कम खर्च में भी मिलते चर्चे,

कक्षा में सबसे आगे होती,

जवाब देना प्रश्न करना आगे रहती।


कभी-कभार सुनेपन में,

याद करती बचपन योवन में,

फिर याद बाल विवाह की आती,

रोकर शाँत होकर पढ़ने लग जाती।


खुद बनाना अपना खाना,

रोज अकेले काॅलेज जाना,

लङकों से भी दोस्ती निभाना,

लङकियों में धोंक जमाना।


मस्त मगन सी खुब हॅसती,

भुल बचपन खुब पढ़ती,

शिकायतें ना थी कुछ भी,

पास हुई प्रथम वर्ष भी।


छुट्टियों में गाँव जाना,

लङके वालों के रोज बहाना,

सोंचती रहती कब काॅलेज जाऊँ,

इन सबसे कैसे खुद को बचाऊँ।


वापस काॅलेज का जमाना,

अब अकेले आना-जाना,

फोन करके बात करती,

माँ-बाप को रोज याद करती।


कभी सण्डे कभी त्योहार,

अब आना जाना बस मनुहार,

आजाद सोंच को पंख मिले,

वर को निश्चित छोङा चाहे कोई ना मिले।


सहेलियों में भी कभी जो जिक्र हुआ,

बाधाओं की सुन फिक्र हुआ,

पर सोंच होगा जो देखा जायेगा,

पास आयेगा जो अब मार खायेगा।


छेङती लङकों को और लङकों सी रहती,

सबकी नजरों में चढ़ी रहती,

हॅसी मुस्कान पर सब मरते,

आये दिन लङकों के प्रपोजल थे।


कई सारे किस्से सुनती रहती,

मन में कभी इच्छा भी जगती,

पर सोंच घर परिवार सारा,

पढ़ाई पर झोंक दिया मन सारा।


दुसरा साल भी गुजर गया,

काफी भार मन का सुलझ गयाक

अब वो खुले विचार चर्चा करती,

पर अब भी वो ठेठ गाँव की थी।


शहर का पहरा और वहाँ रहना,

पर कुछ भी नया ना बन पाई,

बस पढ़ने अपनी डीग्री थी बनाई,

फिर गाँव छुट्टियाँ बिताने आई।


फिर से लोग पुँछ रहे,

ससुराल जाने की रट लगा रहे,

अब सामाजिक दबाव बढ़ा,

समाज के लोगो ने खुलकर कहा।


दबाव में आकर सुने मन,

सुनी को कहा जाना पङेगा अब,

वहीं से अपना अंतिम वर्ष करना,

अब हम पर तु बोझ बन ना।


सुनकर दहल उठी वो प्यारी अब,

समझ रही थी क्या बात अब,

पर साफ शब्दों से मना किया,

नहीं जाना मुझे चाहे पङे मरना।


तर्क के साथ अब बात थी,

कह रही कह दो नहीं जा रही,

आप क्या मुझे बेंच रहे,

मेरे मन की एक बार भी नहीं सोंच रहे।


बहिनों के ससुराल से दबाव बढ़ा,

समाज में किरकिरी का और डर बढ़ा,

बहिष्कार में जी नहीं पायेंगे,

ये जहर हम पी नहीं पायेंगे।


फिर सुबह से आ डटे वर वाले,

सहमें उलझे डरे हुए घर वाले,

बोल रहे ये नहीं मान रही,

वो बोले भेज दो हम मना लेंगे।


पिता का मन था अनसुना सा,

बोले जा रहे वो बेबुना सा,

फिर पिता ने ही हाथ जोङे,

अभी नहीं भेजेंगे आप ही मानें।


देते गाली-चिल्लाते से,

जोने लगे धमकी वाले स्वर से,

अगली बार समाज में बेठेंगे,

अब इसे वहीं निपटेंगे।


सहमी डरी सुनी थी,

असंमझस में पुरी फुटी थी,

माँ ने डाटा बहिन ने लताङा अबके,

एक-दो ने समझाया फिर से।


रेती गई बोलती रही,

पढ़ना है नौकरी लगना है,

आप कहो जो मांनुगी मैं,

पर उसे पंसद नहीं करती, वर नहीं मांनुगीं मैं।


खरी खोटी खुब हुई,

पर बेटी की ही जीत हुई,

माँ ने पुचकारा और संभाला,

बहिनों ने फिर बनाया बहाना।


फिर से गई पढ़ने को,

अबके मन भारी रखती वो,

पुछते मकान वाले व सहेलियाँ भी,

कैसे सुनी-सुनी है मुनि तु।


कुछ कहती कभी-कभी रोती,

जैसे-जैसे दिन गिनती वो,

अब खर्चा और कम मिला,

पापा को कहना मुश्किल रहा।


धीरे-धीरे महिनें बीते,

कम जाती गाँव और दिन थे रीते,

अपनी मौज में कुछ वापसी की,

काॅलेज लाइफ को पुरी जी।


बोझ तले भी वो खुश थी,

सखियाँ उसकी मौज से थी चिढ़ती,

पर सबकी वो अब जान बनी,

वहाँ उसकी खुब जान पहचान बनी।


घर का अब दबाव नहीं,

पढृाई पर फिर ध्यान लगा रही,

आखिर काॅलेज पढ़ाई पुरी हूई,

बी.एड की अब पढ़ाई शुरु हुई।


मस्ती के दिन अब व्यस्तता में जाने को,

शिक्षिका बन आजीविका कमाने को,

एक नया लक्ष्य साधे फिरती,

घर वालों के फिस की कहती।


पिता का साथ मिला फिर से,

भाई-बहिन पास फिर से,

अब तो डिग्रीधारी थी वो,

पुरे गाँव में सबसे पढ़ी लिखी थी वो।।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं...कब / Main kab

जैसे तुम वैसे मैं / Jaise tum vaise main

काश ! तुम होती साथ / Kash ! Tum hoti sath