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धोबी का कुता / ghar ka kuta/ besahara

 धोबी का कुता रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा। करता क्या कुता बेचारा सब सहता वो लाचारा। सदस्य घर का वो कहलाता नौकर सा उसको मालिक रखवाता। जो कहा वो करना जो ना उसको आता तो गाली गलोच से पेट भराता। तो क्या उसका मन नहीं भर आता वह मन में कहाहता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता ना घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। लात मिले जो बात ना आये समझ। बिना वजह मजाक उसकी मालिक रिश्तेदार बनाता। काम घर के करता रखवाली घर की करता। फिर भी गमों का साया छाया रहता मन ही मन पुछता। रोटी खाई तो सब सहना होगा। घर का कुता घर का ना घाट का बनकर रहना होगा। सपने घर में रह महल के देखे पर पुरे ना देखने को मिले। जाकर घर से बाहर रह नहीं पाया। घर के कुते ने घर में ही पैर जमाया। बाहर जाकर खाये क्या कुता सोंच वापस घर पर आया। मालिक की मिली वो ही लताङ वही मार। कहने लगा मन ही मन होकर उदास। रोटी खाई तो क्या सब सहना होगा। धोबी का कुता घर का ना घाट का होकर रहना होगा।। -कवितारानी।

हारा हूँ मैं / hara hun main

  हारा हूँ मैं हारा दर्द का मारा मैं लाचारा जाऊँ कहाँ। अपनों का मारा मैं बैचारा होकर बेसहारा जाऊँ कहाँ। दर्द से कराहता मन, बहती आँखे दिखाऊँ कहाँ। वक्त का मारा हालात का मारा जाऊँ कहाँ। खुद से परेशान दुनिया से नाराज जाऊँ कहाँ। गम भरे कई सारे इसे बतलाऊँ कहाँ। बेपर्दा होता तारतार होता मन दिखाऊँ कहाँ। बेइज्जती सहता बेईमान होता समझाऊँ कहाँ। शरण जो रण रही आश्रित तो श्रापित रही सुनाऊँ कहाँ। हारा दुख दर्द का मारा अब बेसहारा जाऊँ कहाँ। किल से चुबते ताने गहराते हॅसी के बाने दिखाऊँ कहाँ। नासमझ, पागल, कुत्ता, जानवर खुद को पाऊँ यहाँ। नौकर, हरामी, नीच खुद आये दिन सुनाऊँ यहाँ। टुकङो पर पलता दुसरों के फोकट खाता जनाऊँ यहाँ। वक्त का मारा गमों का सारा बोझ दिखाऊँ कहाँ। लेता कभी ईश्वर साथ कभी मुन्ना, मुनिया से करता बात। दर्द उनके महसुस करता आँसु उनके पुछता। पर खुद के आँसु दिखलाऊँ कहाँ। हारा दर्द का मारा में लाचारा जाऊँ कहाँ।। -कवितारानी।

कहाँ जाए / kahan jaye

  कहाँ जाए जग-जग घुमु, हर नयनों में ढुँढु। कहीं हो तेरा सामना, कहीं हो जाए सामना। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ। तु जो कह दे तो तारों संग सारा नुर बिछाऊँ यहाँ। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाऊँ कहाँ। किस-किस से पुछे तेरा पता, किस-किस को कब तक निहारें यहाँ। ना होता एतबार किसी पर ना विश्वास यहाँ, फिर हम जाए कहाँ। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ। मन मेरा मन संजोए है ख्वाब कई, सपने कई। तुम जो मिलोगे तो होगी पलकों पर तेरी सराहना। होगा ना जग से कोई सिकवा ना रब से कोई गीला। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ वहाँ, जाएँ वहाँ। पर अभी तो तेरी यादों के दुनियाँ से जाए कहाँ। जग घुमने से मिलता तु तो नयन सब जगह लङाए यहाँ। ये माटी की मुरत देगी साथ कब तक यहाँ। अब आ भी जा नयनों से नयन मिला ना दूर जा ना दूर जा। मिट्टी की मुरत ये भोली सी सुरत लेकर जाएँ कहाँ, जाए कहाँ।। -कवितारानी।

साँझ सवेरे, मन के ढेरे / sanjh savere, man ke dhere

  साँझ सवेरे, मन के ढेरे दर-दर भटका लेकर मृत्युलोक का मटका। ना पाया द्वार तेरा, मंदिर-मंदिर टटोले, द्वार-द्वार पर बोले। क्या यहाँ हरि का आसरा। बिती गई रैना, पर रैना पर कोई नहीं पाया कम तेरा मेरा फासला। मन से बोले-तन को टटोले, क्या हो पाया कोई सासरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। गोधुलि बैला की रैला में पाया पावन सारा संसार यहाँ। कर भक्ति लेकर तन-मन की शक्ति के होये अब तेरा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। दिन-दिन घुमें संत-साधु के भी लुमे, हो ध्यान मग्न। होकर भजन रत होकर अन्तर्मुखी ढुंढा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। शाम को हर दिन करते आरती ढुब भक्ति रंग में पुजते हम पारथी। क्या दुनिया जब क्या संसार यहाँ बस तेरा मेरा था यहाँ फासला। क्या है यहाँ हरि का आसरा। फिर जब मामा चन्दा आए नीन्द गहरी लाए तब सपनों से तेरा सामना। लोक लुभावन लागा वो सब मनोहर लगा वो क्या ये तेरा आसरा। क्या है यहाँ हरि का आसरा। सब से पुछा हर भक्त से पुछा सक्स हर से पुछा पर कहीं ना मिला। तेरा आसरा, क्या है तेरा आसरा, कहाँ है तेरा आसरा, कैसे पाऊँ तेरा आसरा। कैसे आऊँ, पास आसरे के कैसे, कैसे, कैसे।। -कवितारानी।

मेरी खोज / meri khoj

 मेरी खोज चल रहा है वक्त निरन्तर बन कर्मठ नैतिक ज्ञानी। मानव हूँ मैं चलना है मुझे भी कर्मठ सा बन कर ज्ञानी। सुनी है राहें जीन पर चलने से डर जाता यहाँ। फिर भी ढुँढने को मन का आसरा भटक आता यहाँ।। मनका आसरा ढूँढूँ, ढूँढूँ मन का टापरा यहाँ। सुख-वैभव से भरा, मान, ज्ञान भरा आसरा ढूँढूँ। जहाँ हो ठंडक मन का आराम तन का जहाँ। जहाँ ईमानदारी, समझदारी हो समाज में ऐसी जगह ढूँढूँ आसरा।। फिर चलते भटक गया नया आसरा ढूँढ रहा हूँ। फिर सपने देखने लगा जो पिछले थे उन्हें भुलने लगा हूँ। फिर नयी दुनिया की तलाश में चल दिया हूँ। फिर मन का आसरा ढूँढ रहा हूँ, फिर नया टापरा ढूँढ रहा हूँ।। पल-पल है दुनिया रंग बदलती हम रहते बेरंग अभी जहाँ। हर पल जहाँ नई सोंच होती हम बैठे एक ही सोंच पर जहाँ। ऐसे में कैसे मैल करूँ वक्त कैसे बने वो आसरा। वक्त के साथ चल कैसे बनाए नया आसरा।। पर रुकना सिखा हमने कहाँ, थकना हमने जाना कहाँ। घबराये ऐसा लक्ष्य साधा नहीं, मंजिल अब दूर नहीं। मंजिल जो सोंची है देगी वो सपनों का आसरा। मिलेगा हमें जरूर अपने सपनों का आसरा।। -कवितारानी।

आपकी याद आती है / Aapki yaad aati hai

आपकी याद आती है गये कहाँ आप काश पता होता। बाकि उम्र में जाने का अहसास तो होता। कुछ याद रख सकुँ उतना तो साथ होता। मम्मी हो आप पता था पर उसका अर्थ काश तब पता होता। लब्ज वो दो जो कहे याद रख सका। ना कहा मम्मी किसी ओर को जो मेरा जवाब रहा। संभाला था होंश जब से आपकी चीजे संभाली है। अनमोल रत्न से किमती उनको संजोयी रखी है। दो अश्रु जो दिए लिए मैंने आते रहते हैं। क्या हुई थी खता के चेहरा धुँधला रहा। गये हो आप जब से गम के साये है। बिन बादल बरख से नयन बरसते आये है। क्या हुई खता जो इतने दर्द मिले। क्या हुई थी वजह की अब भी ये थमते नहीं। कल था निकल गया आज है चल रहा पर क्या आगे भी होगा यही। पाप है साथ पिछले जन्म का या वास्तु दोष साथ। कर्म ही है दर्द या दर्द ही कर्म की वजह। कहाँ, से क्या शुरु करुँ और कहाँ करुँ खत्म, अब तुम्ही बताओ। अब तुम ही बताओ, माँ तुम ही बताओ।।   -कवितारानी।

सहमा सहमा हूँ / sahma sahma hun

 सहमा सहमा हूँ सहरा-सहरा बन मोहरा चढ़ रहे घोङी। सहरा-सहरा बन मोहरा घूमा रहे अपनी लोरी। कहीं चहका-चहकी चहके, कहीं हवा दवा बन महके। कहीं मन-मौजी दिखे, कहीं तन तौजी बिके। कहीं हाव-भाव से मारे कोई, कहीं नैनों से करे वार पार। गहरा-गहरा कर घाव ताव चढ़ावे कोई। पहरा-पहरा कर मान बढ़ावे कोई। कहीं मन लुट खसुट चलत रही कहीं नयन मटक्का। कहीं ठुमका-ठुमकी होय रही। कहीं छुमकी-झुमका खोय रही। कहीं होय मन बावरा कहीं तन बावरा। सहला-सहला कर समझाये कोई। सहला-बहला कर भङकाये कोई। कहीं लु चली प्रेम दीवानी बन। कहीं बरखा सावन सा हो जाए मन। कहीं अप्सरा दिखे कहीं परी पर फिर मन ना होए बरी। सहमा-सहमा दिल पर ना जाए कहीं। घबरा-घबराया मन अब ना लागे कहीं। डरा सहमा यह समझाए सभी।। -कवितारानी।

तुम्हें भुलायें कैसे / tumhe bhulaye kaise

 तुम्हें भुलायें कैसे बिखरते सपने संजोये कैसे, तेरी याद को मिटाये कैसे। सपने दिखा गये हो आप, इन्हें हकीकत बनाये कैसे। नूर भरे चेहरे कई देखे थे, हुस्न के खजाने कई देखे थे। पर जो चाहत देखी है आपकी आँखों में उन्हें भुलाये कैसे। पहली नजर रही और पहला प्यार हुआ इसे जताएँ कैसे। पहली एक रात हसीन निकल गई आप अपने घर गई। पर दे गई दर्द कई उन्हें जहन से अपनी मिटाए कैसे। अब तक करते थे नयनों की चोरी हुई ना हुई थी दिल की चोरी। नैनों से हुआ जब मिलने की आस है और बस प्यार है बस प्यार है। इस प्यार को परवान चढ़ाये कैसे आपको अपना बनाये कैसे। कहीं कोई धोखा तो नहीं हुआ मन यूँ ही गुम तो नहीं हुआ। यूँ ही न तङपते रह जाएँ कहीं पटरी से गाङी उतर ना जाए कहीं। कैसे हाल अपना सुनाएँ आपको कैसे अधुरी कहानी बताएँ आपको। हाल बैहाल हुआ है अब इसे सही हाल लाए कैसे। सपने जो पल भर में संजोए है पुरे उन्हें बनाए कैसे। बिखरते सपने संजोए कैसे, तेरी याद को मिटाए कैसे। तेरी याद को मिटाए कैसे।। -कवितारानी।

किसे ढुँढते हो / kise dhundhte ho

किसे ढुँढते हो मिला नहीं किसी ज्ञानी को सुलभ उसे ढुँढते हो। मिला नहीं किसी विज्ञानी को कहाँ ढुँढते हो। वो है जो मन में तेरे तन में तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो। वो है जो कण-कण में पास आस तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो। जो सिर्फ देता है दाता बन वो है उद्दारक बङा महान्। जो सिर्फ दया, प्रेम, करुणा माँगे उसे क्या तुम देते हो। है अज्ञानी मानव उसका आशिष पाने को जुर्म की प्रार्थना करते हो। है मुढ़ बुध्दि मानव अपमानित कर उसे दया की भिख मांगते हो। करते प्रार्थना जिसकी धरती अम्बर बन पावन घङी में शुध्द हो। करते ऋषि, संत महात्मा योग, दान, धर्म की नैकी हो। मिले ना उनको आसानी से उसे तुम दबाव से माँगते हो। पुजा खुद कर सको तो दुसरों पर उसे ताङते हो। ये दिया उसका है अवसर देता वो गंवा रहे तो हो तुम फिर रोओगे। जब देना होगा मन उसे जब होगा तोल तब तुझे। महाज्ञानी है वो, महा दयालु है वो भक्तों के उध्दारक है। अहिंसक है वो शुध्दता, क्षमा, दया, भाव के पारखी है वो। उसे अँधेरे में रख हो तो ना कुछ काम फिर कैसे बुरे करते हो आप। कृपा पा जाओगे उसकी राह पकङो। ईर्ष्या छोङ मुर्ख से भी मिलता है ज्ञान क्यों फिर ज्ञानी से करे बैर। है ...

शाँत मेरा मन / shant mera man

 शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था वातावरण, शाँत-शाँत था मेरा आवरण। थी शाँति ऐसी छोई के वातावरण में फैली थी गहराई। थी शाँति अनहोनी की आहट की किसी गाज के गिरने की। शाँत था शाँत मेरा मन, शाँत मेरा मन शाँत-शाँत था मेरा आवरण। लो आहट थी जो वो आ गई, शाँति को तार-तार कर गई। कर कई भस्म रुकावटें कर गई भस्म कई यादें। बस दर्द दे गई, बस दर्द दे गई, बस साँस रह गई। अक्ष बहे अश्रु से, नीर बहे नयनों से। हर भाव बहे, हर चाव बहे, बह गये सपने नयनों से। बन बेरी दोऊ आए चढ़, मुझ से कर आए सर। बन ज्वाला दोनों ओर से जला दिया मन शाँत कर। रह गई दर्द की आस रह गई वही पुरानी तरह की बास। पर समय है बदला-बदला है जमाना। अब गाज ओर गिर सकती है अब गाज भारी पङ सकती है। है जलन भरी मन में एक के एक मुङ बुद्दी है बाप। दुश्मनी रखी बिन मतलब बिता दिए कई साल। अब राख होना बाकि है या बन पंछी उङना है। अब यहाँ मुश्किल मेरा रुकना है, मुश्किल मेरा रुकना है। बेरी जहाँ जमाना, घर में भी नहीं प्यार दाना फिर कहाँ हो आना जाना। कहाँ हो आना जाना पर फिर है शाँत मन फिर है मन शाँत। मेरे सपने शाँत मेरे अपने शाँत।। -कवितारानी।

यादें धुंधला रही है / yaadein dhundhla rhi hai

 यादें धुंधला रही है सपने अधुरे रहने का डर सता रहा है। अपने से दुर होने का डर बढ़ा जा रहा है। दुनिया में अस्तित्व ना बनने से मन कुछ भुला रहा है। भूलता लम्हें, सजोएँ लम्हे धुँधला रहे हैं। यादें ताजा थी अब तक, अपने साथ थे अब तक। दुनिया रंग भरी थी अब तक, सपने सुहाने थे अब तक। पर अब यादें दूर जा रही है, अपने दूर जा रहे हैं। दुनियाँ बेरंग नजर आ रही है, सपने धुँधले हो गये हैं। यादें धुँधला रही है। जैसे घना कोहरा बढ़, दृश्य धुँध लाता है। जैसे घना धुँआ चहूँ और बढ़ता जा रहा हो। जैसे बादल जमीं पर आ गये हो। जैसे सबसे बहुत दूर आ गये हो, वैसे ही यादें धुँधला रही है। ये यादें धुँधला रही है। कितने अरसे बीते, कितने साल बिते। हर अरसे बरसे संजोयी जिन्हें, वो आज धुँधला रही है। अदृश्य ना हो जाए डर रहता है, कहीं मिट ना जाए यादें डरते हैं। फिर ना जी पायेंगे वो मित्र, फिर ना पायेंगे वो अपने इसी से डरते है। धुँधलाई यादें डराती है, धुँधलाए सपने डराते है। धुँधलाए जी ना पायेंगे, यादों को फिर दोहरायेंगे। करते रहेंगे याद उन्हें फिर ना धुँधलायेंगे, यादें धुँधलाई है।। -कवितारानी।

फाल्गुण आया / Falgun hai Aaya

 फाल्गुण आया हर्षोउल्लास का मौसम आया, सब तरफ फाल्गुण लहराया। मीठे सपनों का समय आया, मन में उमंगे हजार लाया। रंगो का त्योहार है आया, सब ने उत्साह से मनाया। देखो, देखो फाल्गुण है आया, मौज मस्ती है लेकर आया। अपनी आभा लहराने आया, मौसम का मिजाज बदलने आया। पतझङ को ये है अपने संग लाया, सर्दी को दूर भगाने आया। देखो-देखो फाल्गुण आया, गर्मी का मौसम लेकर है आया। प्यार मोहब्बत मन में भरने आया, ऋत मिलन की मन में जगाने आया। तङप अजब सी जगाने आया, मीत से अपने को है मिलाने आया। फिर नये रंग भरने जीवन है अपने आया, फिर उत्साह का संचार है करने आया। देखो-देखो मस्ती भरा मस्ताना आया, देखो देखो फाल्गुण है आया।। -कवितारानी।

हॅसो की कहानी / hanso ki kahani

  हॅसो की कहानी दो हंसो का जोङा होता, होता दोनो का मन मैल। एक जीये तो दुजा, नहीं बिन दूजे जीवन रैन। कमी आज तुम्हारी हुई, तुम बिन ना जीवन रैल। पूर्ण अंग होती तुम, होती फिर अर्ध्दांगिनी। तरक्की के पिछे होती, होती वैभव की रानी। तुमसे घर मंदिर होता, मुझसे होती सेज। मैं दिया होता हार का, होती तुम रोशन चहूँ ओर। मैं कर्म करता बाहर, तुम नैतिकता लाती धर्म संग। नारी घर का चिराग होती नर उसमें तेल। रोशन होता घर जब मिला करते दोनों मैल। जब तक ना होता सच्चा मैल बनता है बेमैल। आज अ्धुरे हैं पर चाहे मन का सच्चा मैल। डुँडते हैं सर्वगुण सम्पन्न तुझको ऐ नारी। जिससे बन सके हम भी नर-नारी। सप्त-चक्र, सप्त व्युह से बन जाए हम साथी और राही। के बन एक चल चले बन पटरी और रैलगाङी। तुम मुझे राह दिखाओ और में संग तेरे बनुँ संग तेरे राही। आओ मैल रचाएँ, रचाएँ एक संसार। सच करले सपने बन कर हम सरकार ही। आओ बन जाए दो हंसो का जोङा जैसे, होता प्रेम अनमोल जिनमें। एक जीये तो दुजा, ना बिन दुजे जीवन ना रैन। -कवितारानी।

मैं व्यस्त / main vyast hun

  मैं व्यस्त हूँ पूर्वांचल मे व्यस्त अपनी ही धून का धूनी मैं। ताजगी की साँसों को लिये हूँ मधुर फिजाओं की खुशबू सी भुनी मैं। आवाजों की आवाजाही है, आवाज अर्न्तमन कराह कहीं। धुनों में बंटा हुआ हूँ, आगाज बर्हीमन वराह राही मैं। किस ओर मुख करुँ, हर ओर महक है फैली सी। धरा काली, धुसर है, हर ओर महक है धुल फैली सी। मृगमरीचिका से खुद ग्रसित, लक्षित अपने राह को। मार्गदर्शक सा चल रहा, पिङित कर अपने आप को। था पश्चिम अस्ताँचल सा रवि फैला अपने आप में। दुर निगाह तकता कवि होता अपने आप में। आवाज अंतिम छोर से आती रहती अपने आवेश में। नियमित, संयमित रवि उदय पुर्व की बन आवाज ये। कथित कथनी कवि लय सुर्य की बन आवाज ये।। -कवितारानी।

मुश्किल है / Mushkil hai

  मुश्किल है कितना मुश्किल है मन को समझाना। यह कह पाना अकेले ही है रह जाना। कितना मुश्किल है मन को बहलाना। कहने को बचपन से बिछुङ गया हूँ मैं। यादों को भी बिसरा चुका हूँ मैं। पर छोङा जब भी अकेला खुद को। वहीं खङा पाया हूँ आज।। कुछ नहीं कमाया मैंने। कुछ नहीं पास मेरे। अपने तो थे नहीं कभी। परायो ने निभाया मुझे।। अब सब कुछ बदला सा लगने लगा है। अब जाने सब छुटा सा लग रहा है। भुल गयी वो चाँदनी मुझे। भुल गयी वो समाये मुझे। मैं भी भुला सा महसुस करता हूँ। मुश्किल है पर जीता रहता हूँ।। उलझा हूँ अपने आशियाने को गढ़ने को। परेशान हूँ अपनी कमियों से। बहुत मुश्किल है सह पाना। उन मधुर यादों की शौगातों को। बहुत कठिन है गुजार पाना। उस यादों के ज्वार को। रहना भी है, सहना भी है, गुजर रहे हैं लम्हें भी। जब भी खाली से बैठे हैं, खो गये वहीं कहीं। फिर दर्द भी जगा, उस दर्द का अहसास भी है। यादों की शौगात भी है और आँखों को प्यास भी है। कितना मुश्किल है तब हर पाना, मन को समझाना।। -कवितारानी।

सब बदल गया है / sab badal gya hai

  सब बदल गया है। बाल पक गये हैं, हाँ बाल पक गये हैं। देखे पुराने चित्रों को तो, समझ आया कि, हम थक गये हैं। वैसे थकान सी सुरत, बैचेनी, उदासी, चेहरे की उङी रोनक, ये पहले भी थी। पहले भी हुआ करते पके बाल, पहले भी रहती खुशी की तलाश, पर आजकल उमर असर ज्यादा है। जिम्मेंदारियों में समय आधा है। सुबह का भोजन, रात की नींद, और खुद की परवाह अब कहाँ। अब तो सुरज उदय होता है, और शाम को अस्त, वही बुढ़े लोगो से दुपहर सोते, और दिन भर काम को रोते। अब सब छुटा सा है, अब सब बदला सा है। सब कुछ मन का होना था। अब मन सब का सा है। हाँ समय बदल गया है। सुरत भी बदल गयी है। गाँ अब मैं बुढ़ा हूँ। अपने अंत को अग्रसर हूँ। पर मैं जिन्दा हूँ।। -कवितारानी।