बातें मन की / batein man ki

बातें मन की

अब तक जिसे सच्चा हितैशी मान रहे थे,
मान रहे थे दिल के करीब जिसे,
अब तक जिसपर विश्वास करते थे,
करते थे बंद आँख भरोसा जिस पर,
अब तक देख जिसे खुश होते थे।
होते हमेशा दिल के करीब जिसके,
कैसे दोखा जिया उसने विश्वास नहीं होता।
कैसे पल में पराया किया विश्वास नहीं आता।

कैसे देखने को जी नहीं करता, पता नहीं।
पता नहीं के दुरियाँ इतनी हुई कैसे विश्वास नहीं आता।
अब तक जीये हँसीन लम्हें जिनके साथ।
आँखों से बातों से किये बनाये रिश्ते हजार।
हजारों यादें बनाने के बाद विश्वास तोङ दिया क्यों।
आखिर क्यों पराया बना दिया खुशियों के लम्हों में।
विश्वास नहीं आता कि कोई इतना करीबी भी बिन मतलब दुर हो जाता है।

विश्वास नहीं होता कि कोई वादा करके भी भुल जाता है।
दगा देता तो रीत बव गई पर, रीत में दगा कुछ समझ नहीं आता।
इस क्षण से जो दगा लगा वो छुङाये छुट नहीं पाता।
विश्वास होता है क्या अब यह भी समझ नहीं आता।।

-कवितारानी।

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