दर्द की राहें / dard ki raahe

दर्द की राहें


अब तक दर्द दिए थे कईयों ने, अब ये पैदा हुआ है।

जब देखा दर्द अपने का तो रोने को मन हुआ है।

पाऊँगा मंजिल में सपनों की अपने पर।

अपनों की दर्द की सिढ़ी पर नहीं।

दर्द को सहते हुए पाना है मंजिल, चुनौती है ये।

चुनौती है ये मेरी मंजिल की राह की।

परीक्षा का है ये समय में इसमें भी पास होऊँगा।

बिछा दो कांटे लाख में इन्हें भी पार कर जाऊँगा।

ना रुकुगाँ ना झुकुँगा, ना हटुगाँ, आगे बढुँगा।

कर दो और कठिन राह, लगा दो रास्तो में आग।

पर हर आग को अपने आसुँओ से बुझाऊँगा।

इन दुख-दर्द और मिलन हीन राहों को पार कर जाऊँगा।

है जब जब तक हौंसला लङुँगा हालातों से।

जब तक है साँस चलुँगा लेकर आस।

रोक ना पाँएगी सिसकिया मेरी मुझी को ना।

रोक पाँएगी कंठिली राहे आप की जब रुक गयी ये।

तो जान मेरी जाएगी, बस अब मंजिल दूर नहीं।

आस है अभी भी यही।।


-कवितारानी।


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