जब मंजिल दुर हो / jab manjil dur ho

 जब मंजिल दुर हो


जब मंजिल दुर हो तो रास्ते धुंधले नजर आते हैं।

जब तैय्यारियाँ अधुरी हो तो काम अधुरा नजर आता है।

जब अपने साथ ना हो तो भीङ में भी अकेले नजर आते हैं।

जब अपने दगा दे तो जहान अधुरा नजर आता है।


पाने को मंजिल निकल जाते है हौंसले में दम है,

पर बिना अपनों के हौंसले कहाँ जुटा पाते है।

निकल पङते हैं राह पर अकेले भी अगर मन में कोई शंका ना हो,

पर बिना अपनों के मंजिल पाने में मजा कहां आता है।


फिर पाने को शिखर सपना मन अपना उतावला है।

तोङ बंधंन छोङ अपने पाने को सपने दिल बेकरार है।

छोङ दे साथ चाहे जहाँ सारा फिर भी आगे बढ़ते जाना है।

नीले आसमान में फिर से लहराना है।


उङ जाना है उस जहान में जहाँ शिखरी लोग रहते हैं।

मिल जाना है उस भीङ में जहाँ पराये परिंदे रहते हैं।

दिखाना है इस जहाँ को कि अब भी है मुझ में क्रांति।

पाना है उस जहान को जहाँ ना हो कोई भ्रांति।


देखेगा ये जहान ओर गुणगान करेगा मेरा,

ऐसा सुनहरा सपना है मन ये मेरा।

चाहे मुश्किले बङे बङ जाए ये रास्ते चलते जाना है मुझे,

अब रुकना नहीं किसी के वास्ते।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

झुठी यारियाँ | Jhuthi yariyan

नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

मैं राही बन चलता हूँ | Main Rahi Ban Chalta hun