मन में खलबली / man mein khalbali

मन में खलबली


आसमान साफ है और राहें खुली-खुली।

हर पता बयां कर रहा है मेरी खली-बली।

मंजिल अब ज्यादा दुर नहीं, है यहीं-कहीं।

जीने को अपने जहांन में बैचेन है मेरे मन की कली।


दुख दर्द भी साथ है, साथ है रह कांटे राह के।

वक्त भी प्रतिकुल है, प्रतिकुल है राहें।

भटका रहा मुझे वो उन्नति का शिखर गली-गली।

हारने का विचार मचा रहा है तन में खली-बली।।


लेकर हार खङी है मंजिल यहीं-कहीं।

देखने को मेरी आँखें मचा रही हल-बली।

देखे हैं जो ख्वाब अब पुरे होंगे।

पुरी होगी मन की देखी हर सुहानी कली।।


अरमान रहते बैचेन सोंचकर कहीं छुट ना जाए राह मेरी।

पथ भ्रष्ट होकर खो ना दुँ मंजिल कहीं।

टुट जाऊँ अगर हो ऐसा।

मर ही जाऊँ ना मिले अगर मंजिल कहीं।

मचा दुँ सोंच अपने मन में यह खलबली।।


-कवितारानी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

झुठी यारियाँ | Jhuthi yariyan

नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

मुझे मुझमें रहने दो / mujhe mujhme rahne do