कौन अपना यहाँ / kon apna yha

कौन अपना यहाँ


कौन यहाँ अपना होता है, जो होता है अपना मेरे लिए वो है सपना,

प्यार कहते हैं किसे किसी ने जताया ही नहीं।

गमों में जीते हैं कैसे जिंदगी ने सिखाया बस यही,

वक्त मिला तो सुहाने दिन पाये पर वो भी दहशत में बिताये।

जब देखता हूँ अपने तो इच्छा होती नहीं अपना कहने की,

जब सुनता हूँ आदर्श पिता, भाई की तो कल्पना तक नहीं होती।

कहाँ मिलते हैं आदर्श देखने की इच्छा रही बहुत,

मुझे तो मिले स्वयं राक्षसी, मतलबी, लालची, मुर्ख।

कैसे कहूँ आदर मैं बङों का करता हूँ,

कैसे में दिल से अपना तक कहूँ।

जब नाश्ते में ताने, भाव में ईर्ष्या और त्योहारों में गालियाँ भर्त्सना मिले।

हर दिन और हर समय रोक टोक मिले।

जब बोले तो चुप करे और ना बोले तो गुन्ना कहे।

घर में रहे तो डरपोक, चुहा और घुमें तो गुण्डा, उठाइगीरा कहे।

जब पङे तो पङाकु किङा और ना पङे तो जाने क्या करेगा।

ऐसे में करुँ तो क्या जाऊँ तो कहाँ, किससे पुछे,

दुख सुनाये किसी से तो दुख बङे ना सुनाये तो दम घुटे।

फिर कैसे मानसिक तैयारी हो और शारीरिक तैय्यारी,

बस कहे तो कहे है राम अब लेना आप संभाल,

जब ना संभले तो बतला देना, फिर मुझे यहाँ नहीं रहना।


-कवितारानी।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं...कब / Main kab

काश ! तुम होती साथ / Kash ! Tum hoti sath

आदिनाथ | Aadinath