मन की आवाज / man ki aavaj

मन की आवाज


तब होती चाह ना ओर जीने की,

तब पकङ हाथ आशा का दम भर जीगर में।

बेहरा होके और अंधा होकर देख मन की,

आँखों से और सुन मतबल की बात।

कर हौंसलों को मजबुत करता नित काम,

एकाग्रचित हो जो करता है लक्ष्य पर वार।

दुनियाँ करती उसको सलाम्, दुनियाँ करती उसे सलाम।

कहती है तब जमीं ना हटुंगी अब छोङुंगी तेरा साथ।

हो चाहे दिन-रात, दलदल हो या दरार।

कहता है ये गगन तु ही है मगन।

दुँगा पुरा तेरा साथ है चाहे ऋत बंसत, बर्खा, सावन आज।

कहती है काया फिर की रहुँगी अब तेरे साथ।

ना छोङुंगी तेरा साथ बस दृढ़ तो तेरा आत्मविश्वास।

तब भगवान कहे आशीर्वाद है मेरा तेरे साथ।

तब में खुद से कहूँ की अब क्या डरने की बात कृपा है।

जब सबकी साथ, तब मन कहे धन्य हो दुनियाँ देवी।

तेरे रुप है अनेक, तू रखती सबका ख्याल,

बस भी लेना संभाल की माया तेरी अपार।


-कवितारानी।

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