सहमा सहमा हूँ / sahma sahma hun
सहमा सहमा हूँ
सहरा-सहरा बन मोहरा चढ़ रहे घोङी।
सहरा-सहरा बन मोहरा घूमा रहे अपनी लोरी।
कहीं चहका-चहकी चहके, कहीं हवा दवा बन महके।
कहीं मन-मौजी दिखे, कहीं तन तौजी बिके।
कहीं हाव-भाव से मारे कोई, कहीं नैनों से करे वार पार।
गहरा-गहरा कर घाव ताव चढ़ावे कोई।
पहरा-पहरा कर मान बढ़ावे कोई।
कहीं मन लुट खसुट चलत रही कहीं नयन मटक्का।
कहीं ठुमका-ठुमकी होय रही।
कहीं छुमकी-झुमका खोय रही।
कहीं होय मन बावरा कहीं तन बावरा।
सहला-सहला कर समझाये कोई।
सहला-बहला कर भङकाये कोई।
कहीं लु चली प्रेम दीवानी बन।
कहीं बरखा सावन सा हो जाए मन।
कहीं अप्सरा दिखे कहीं परी पर फिर मन ना होए बरी।
सहमा-सहमा दिल पर ना जाए कहीं।
घबरा-घबराया मन अब ना लागे कहीं।
डरा सहमा यह समझाए सभी।।
-कवितारानी।
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