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बादलों की ओट से / badalo ki oat se

 बादलों की ओट से  हवायें तेज हुई, धुल भरी, चुभन भरी। दिख ना रहा रास्ता, ना कोई किरण भी। साफ आसमान ढक सा गया, भर ही गया। छुप गया सुरज, बादलों की ओट से।। एक मधुर मुस्कान सी, लकीरें नसीब सी। कुछ तेज लिये, आवेश लिये। सुहानी गुंबद सी, दिख रही तस्वीर सी। बादलों की ओट से, बादलों की ओट से।। संध्या की लाली में, गर्मी की चुभन से। राहत बनती पर्दे सी हवायें लिये नमी सी। ले जाती मेघों को, नजरों के हुलारे सी। मन को भाती किरणें, दिख रही बादलों की ओट से।। चुभन हुई कुछ ओट हटी, शर्म हुई सी नजर हटी। कुछ पल देख इधर, फिर से नजर वही डटी। मुस्कान मधुर वो आ रही, मन को भा रही। बादलों की ओट से, बादलों की ओट से।। अच्छा हुआ अकेला हूँ, मन से आह्लादित हूँ। जी रहा हूँ बस अभी, देख रहा हूँ सभी। वो आशाओं की जमीन, वो उम्मीद की लकीर। आ रही है जो, बादलों की ओट से।। हवायें जाये, हो जाये शाँत सब। आब छा जाये घटायें, हो जाये अँधेरा अब। ढल रहा रवि भी, भर गया रवि भी। जो देखी मधुर शाम, बादलों की ओट से। बादलों की ओट से।। -कवितारानी।

अब मन नहीं करता / Ab man nahi lagta

अब मन नहीं करता अब मन नहीं करता। कि तु ही हो पास। अब मन नहीं करता। कि सपने हो साज। अब साजन सी तु है नहीं। अब पिया के मन की तु नहीं। अब है नहीं शिकायतें कोई। अब तेरे बातें बेमतलब है। अब तुझसे मेरा मन नहीं।। आँखो में भर दोखा। बातों में भरलो चोखा। चाहे कर लो मिठ्ठी बात। आँखों को सजा लो आज। चाहे कर लो 16 सिंगार। हो चाहे तारो की भात। पर अब वो सब भुला ना जायेगा। तुझ पर अब मन नहीं आयेगा। अब बाहों में भरने का मन नहीं करता। अब जन्नतें भी जान्नुम हैं। अब तुझ बिन जिन्दगी है। तेरी सारी बातें बेमतलब अब। अब कुछ मन नहीं करता। अब मन नहीं करता। अब मन नहीं करता।। -कवितारानी।

प्रगति पथ पर गीत / Pragati path par geet

 प्रगति पथ पर गीत जीवन की इन रिमझिम झङियों में। बहती नदियाँ और दरियाँ में। आशाओं की थाम ढोर। साँसो की लय से देखता भोर। रोज नये सपने बुना करता हूँ। मैं प्रगति पथ को चुना करता हूँ। लहरे नहीं सैलाब आते। दरियाँ को सागर बनाते। ढुबा देते रोज बने मेरे मकानों को। मैं फिर सुदृढ़ किले गढ़ा करता हूँ। आशाओं की थाम ढोर। साँसो को ले जाकर छोर। रोज नये सपने बुना करता हूँ। मैं प्रगति पथ चुना करता हूँ। आज साथ है वो कल था नहीं। जो कल था साथ आज दिखता नहीं। रोज बदलते इंसानों को देखा करता हूँ। मौसम के नये-नये नजारे देखा करता हूँ। जब तक मिलती नहीं मंजिल मुझे। मैं ऐसे नया गीत लिखता हूँ। मैं रोज आशाओं पर जिया करता हूँ। हर शाम घुटता हूँ हर रात मरता हूँ। हर भौर जगाती जीवित फिर। फिर से प्रगति पथ चुनता हूँ। मैं रोज प्रगति पथ पर चलता हूँ। मैं रोज आगे बढ़ता हूँ।। -कवितारानी।

मोर संग / mor sang

मोर संग एक शाम गुलाबी। एक नैन शराबी। कजरारे काले हैं। पंखो पर शरारे हैं। मोरध्वज सुंदर। शाम रंग अति सुंदर। मधुर मय के प्याले ये। नैन रसीले प्यारे हैं।। छत पर शीतल पवन। एक ताङ, नीम और शहर। एक अमरुद फलित है। शाम मधुर है। मेर श्रृंगार विकट बैठा। देखता कभी, कभी सजता। सखा शाम आज मयुर। शाम गुलाबी है मधुर। शमा खफा मैं खुश। बैरी बैठी मैं खुश। अलग रंग अलग ढंग। शाम गुलाबी मधुर रंग। कप का प्याला। करता मतवाला। अब बहाना। मैं मतवाला। उङ चला मोर संग। उसके रंग।। -कवितारानी।

आशाओं को पुतला मैं / Aashao ka putla main

  आशाओं को पुतला मैं मैं आशाओं का पुतला, जलता अपने आप से। नहीं किसी की बुराई खाई, ना ही जला किसी के ताप से। अपनी कमीयों का मारा, मैं फिरता जला सा तेजाब से। दर-दर को आशियाना मांगता, मैं जाता जलता अपने आप से।। कल था शुरवीरों के साथ, अपने तेज से था प्रकाश में। खुब कोशिशें की चमकनें की, मिटा दिया अंधकार में। फिर से जमीन बदली गई, बदला है आप मेरा बदलाव में। निस्तेज तेज छुपा हुआ है, छुपा हुआ जैसे बादलों की आङ में।। आशा सर्पीली ढंस रही जीवन सार ये। रोज नया सपना बुनती, कहती है यही संसार ये। भुल भुलय्या नहीं जमती, नहीं भाता प्रकाश ये। रोज भुगते दर्द नया, लगता जो सहा हुआ ताप ये।। पश्चिम का सफर किया, छः माह था जैसे शोक संताप में। रोज पुरब निहारता, करता याद अपनी जमीन रात में। शाला का ताला होता, खुलता था ताला दुःख विषाद में। कोठी में जाकर भोजन होता , खुोया रहता वहाँ हमेशा आप में।। कहाँ सुकुन है मालिक मेरे कहाँ सवेरा लिखा ये। रोज उठता अब विन तङपे पर बंधी नहीं आस ये। जा टिकती है अनजानों में ढंसते रहते जो हर बात वे। समझ ना पाता कैसे मन को भाते सब इन्सान वे।। ठहर कहीं साँस लुँ की सुकन जहान आराम रहे।...

बात सीधी थी वो / baat sidhi thi vo

बात सीधी थी वो बात सीधी थी वो, सीधे दिल तक गई। पर अनजाने ही सील सी गई। एक तरफा है प्यार तभी सहते हैं। अक्सर आपकी बात कहते हैं। कोई चाह कैसे बनाये। सपने बन कोई कैसे छाये। कैसे कोई प्यार जगाये। सोये ह्रदय को उपवन बनाये। हमने रस्ते खोले हैं। बिन मतलब लोगों को तोले हैं। कुछ समझ परे दिल से ही। पर जो भाया वो मेरा था। कोशिशें नहीं की पाने की। पा ना सका खुशी जमाने की। उसी दुख को जीते हैं। अकेले में तुम्हें याद करते हैं। और लब्जों को परदा करते हैं। सीधे शब्दों को जीते हैं। मुश्किल होते यही बात है। वक्त अकेले कटता है।। -कवितारानी।

मैं रोज नये सपने बुनता हूँ / Main roj naye sapne bunta hun

मैं रोज नये सपने बुनता हूँ मैं रोज बनता बिगङता। उठता-गिरता, चलता, रुकता हूँ। मैं सपनें आज भी सुनहरे कल के बुनता हूँ।। आज भी मेरा मन वैसा है। था कङवा बचपन जो, तन आज भी वैसा है। मैं आज भी इस आज को बदलना चाहता हूँ। मैं रोज नये सपने सजाता हूँ।। वो मखमल सा बिस्तर आज भी दुर कहीं। दुर है आज भी महल मेरा वो। आज भी प्रेम पिपासा खाती है। रोज रात आज भी किसी की याद सताती है।। मैं अपनी राहें खोजता फिरता हूँ। मैं आज भी सुनहरे सपने देखता हूँ। टुट-टुट के बिसरा सा मैं। मन-ही-मन अकेला मैं। भीङ मैं भी सुकुन खोजता हूँ। मैं रोज नये लोग चुनता हूँ। मैं रोज नये सपने बुनता हूँ। मैं रोज नये सपने बुनता हूँ।। -कवितारानी। 

समय गुजार रहें है / samay gujar rhe hai

समय गुजार रहें है सपनों की जिंदगी जी रहे हैं। हाँ जो देखा था ख्वाब वही जी रहे हैं। जी नौकरी कर रहे हैं। या कहे समय गुजार रहे हैं।। सोंचा था ख्वाब हसीन होगा। मिलेगी नौकरी ते सब कुछ अच्छा होगा। जी सैलेरी आती है। या कहे जरुरतें पुरी हो जाती है।। ज्यादा लोड नहीं इतना भी। काम के बदले दाम जो मिलता है। जी हाँ काम पर काम ही मिलता है। या यूँ कहे एक का सुकून सा नहीं मिलता है।। अपना काम ही करते हैं। नहीं अपना और नाकारों का काम भी करते हैं। जी ईमानदारी जिंदा है यहाँ। या यूँ कहे ईमानदारी तो है ही ईमानदारों के लिए।। बेइमानों की मौज कहें। आलसियों की तो आराम कहे। जी यही तो बस रह गया है। लुटो जिसे लुटना है।। मैं भी समय पर जाता हूँ। काम करता हूँ और कमाता हूँ। भेदभाव सहते भर गया हूँ। या कहूँ अब बस समय गुजार रहा हूँ।। विरोधी नकारात्मकता-भेदभाव का किया है। संघर्ष और धामें सहे है। अलगाव और बुराई को पाया हूँ। ईमानदारी कर्मठ अकेला रहा गया हूँ।। मन से मजबुत हूँ काम करता हूँ। कर्मठता सहनशीलता दिखलाता हूँ। मजबुर हूँ काम-वेतन पाने को। इसीलिए टिक कर समय गुजार रहा हूँ।। देशहित जैसी बात नहीं आती अब। कुछ नया करने की ...

अब तो / Ab to

  अब तो अब कोई शिकायतें नहीं, अब कोई रुठना नहीं। अब कोई बहाना नहीं, अब कोई रुसना नहीं। अब तो जाने देते हैं, कहते नहीं बस जीते जाते हैं। अब तो बस सुनते हैं, अब तो बस सहते हैं।। समय गुजर जाता है, घङी देखे बिना। रात हो जाती है सुरज देखे बिना। बंद कमरों से बस आवाजे आती है। अब तो मकान के अंदर जिंदगी जी जाती है।। किसी से कहना अब आसान नहीं रहा। कुछ बताना किसी को गँवारा नहीं रहा। सब मन तक ही रखना उचित लगता है। अब तो अकेले रहना ही सबसे सही लगता है।। मतलब तक ही तो अब बात होती है। स्वार्थ के बिना कोई याद नहीं होती है। लोगों की भीङ चुभन करती है। जिन्दगी अब बस मन में हँसती है।। -कवितारानी।

बात पुरानी, यादें / baat purani aur yadein

  बात पुरानी, यादें शादी, पार्टी हो या कोई त्योहार, करें और मनायें अपना त्योहार। मौज करें मस्ती करें और करें दुसरों से सदव्यवहार। देंखे नयनों में गौरी के और करें पल भर में उससे प्यार। दोस्त के साथ रहे उसके मन में भी वो रहे कहे वो अपना यार। दिन बीता रात गई फिर ना वो रही रहा बस उसका इंतजार। बीते दिन की बात कह कर फिर करें नयी का इंतजार। दोस्त कहे और जग कहे की ये सब है बेकार। नयन रहे भंवरा बन चुसे रस हजार। बात पते की मैं कहूँ जीना है जग में तो होता रहेगा प्यार। कब तक अकेले जग में रह  पाओगे मेरे यार। मौज करो-करो नयन मटक्के तो क्या ना मिल पाए प्यार। जो मिले पल मजा लो और करो अपनी वाली का इंतजार। पर दिल पर जो इसे है लेता वो हो जाता दग में बेकार। फिर जग काम का उसके फिर ना वो जग के आये किसी काम। इसीलिए प्यार में ढुबो मत नहीं तो हो जाओगे लाचार। बस मौज करो मस्ती करो रहो हर पल बिंदास। दिल टुटे ना किसी का ना हो अपना कोई नुकसान। बात पते की ये है दुर रहो इस सब से तभी है मजे की बात।। -कवितारानी।

चलो मौज कर ले / chalo aaj mauj kar le

  चलो मौज कर ले वो पुराने दिन फिर याद कर लुँ। पकङ खुशियों का नाता गमों से रिश्ता तोङ लुँ। चलो आज खुद से ये सवाल कर लुँ। नाता रहे ये जीवन भर या सपने ही दुनियाँ कर लुँ। जीवन अनमोल को आज खुशियों का मोल कर लुँ। चलो आज खुशियों को नया कर लो पुराने खुशी वाले लम्हें नये कर ले। चले फिर से उसी आसमां के निचे जहाँ सिर्फ अपनी दुनिया हो। करे वही जो दिल ने सोंचा था कभी, जो किसी ने सोंचा ना कभी। चलो आज गमों पर ताला लगा दें, चलो कुछ नये लम्हें गढ़ ले। मौज वही होगी, मस्ती वहीं वही होगा मजा चलो इन्हें अपना करलें। आज नहीं किया तो कल ना ये होगा फिर ये सब ना होगा। ना होगी फिर से बचकानी हरकतें ना होगा इतना गहरा प्यार। ना होगी इतनी आजादी ना मिलेगा समय इतना। चलो आज सारी कमी पुरी करलें, जो मौज रही बाकी पुरा उसे करलें। आज ना कोई करें ना जवाब बस मौज कर लें। आज अपना ही आनन्द हो और सब बेफिक्र हो। आज सब आनन्दित हो आज सब मौज में हो। चलो आज कुछ पुराने सा कर ले, चलो आज उसे नया कर ले। चलो आज फिर वही सवाल कर ले। चलो आज मौज कर ले।। -कवितारानी।

श्याम नाम रंग / shyam naam rang

  श्याम नाम रंग श्याम नाम रंग ले, हम श्याम नाम रंग ले। श्याम की है जो सच्चाई नाम नाम है वो पाई। जो सच है वो श्याम जो रत है वही नाम। जो कर्मठ ज्ञानी सा फिरे पर जिसमें नहीं राम है। जो ज्ञान, दान की बैत करें पर जिसमें नहीं राम है। जो ढोंग करे पाखण्ड करे दुनिया में बस अपनी झोली उसमें कहाँ राम है। वो अधुरा अज्ञानी है उसका नहीं उध्दार है। श्याम नाम रंग ले, हम श्याम नाम रंग। बैठा जो अकर्मठ बन के, लिए जो राम का नाम है। करता निर्मल मन, कर्म से सेवा जो दिन रात है उसमें राम नाम है। होता जो ज्ञानी करता बात धर्म सर्वहित कि जो, होता वो राम प्रिय वो। जो पुण्य काम कर, राम नाम कर रहता इस लोक में। जो कर्म करे सत्कर्म करे जो राम नाम दिन रात करें। सुनते प्रभु उनकी ही जो होते राम प्रिय वो होता उनका उध्दार यहाँ। श्याम नाम रंग ले हम श्याम नाम रंग ले। उसपे जो विश्वास है जो जग पार वो लगवायेंगे। जो रंगा श्याम रंग में हो तो उध्दार वो उसका कर पोयेंगे। जो करता सत्कर्म यहाँ होता कर्मठ भक्त जो राम का। होता नाम जग में और पाता पावन रंग श्याम का। रंगा हुआ है जो श्याम वही पार पायेगा दुख, दर्द, दुनिया वही सह पायेगा। ...