मंजिल की तलाश में / Manjil ki talash mein



मंजिल की तलाश में


मंजिल की तलाश में आज फिर डगर-डगर।

आज फिर द्वार-द्वार ढुँढ रहा मंजिल अपनी।

जिन्दगी की राह में कठिनाईयों की राह में।

फिर रहा मगर-मगर आज भी मिली नहीं मंजिल।

हर जगह ठहर-ठहर पुँछ रहा पता मगर।

भटका रहा राहगीर मुझे फिर कैसे मिले मंजिल।

हर जगह लुट है हर जगह है धोखा।

जो दे रहा राही को मंजिल का टोटा।

मिले किसे इस झुठे संसार में मंजिल यहाँ।

कलयुग का है काल बङा भटका राही राह का।

मंजिल की तलाश छोङ दी किसी ने।

मंजिल की राह मोङ दी किसी ने।

मंजिल को लुट लिया किसी ने दलाली छेङ।

हर कोई जाना चाह रहा इस ऊँची इमारत पर।

पैसों के ढेर हो जहाँ आलस का आसमां।

धरती को पुछता नहीं  आकाश में हो पैर जहाँ।

गरीबों की सोंचता ना जन्तुओं की जहाँ।

ऐसी मंजिल है आम यहाँ, फिर भी।

मंजिल की तलाश में मंजिल वाला।

घुम रहा डगर-डगर, द्वार-द्वार अन्त नहीं।

इस राह का कौन, कौनसी है ये मंजिल पता कहाँ।।


-कवितारानी।

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