अकेले में पल मेरे / Akele mein pal mere

अकेले में पल मेरे


करके आँख मिचौली, करके हेरा-फेरी।

करके घुम-धङाका, करके मौज मस्ती।

झुम-झुम के घुम-घुम के, रो धोकर हँसकर गुजारे जो पल वो थे बचपन के पल।

हर्श उल्लास से, यादों के साथ से, दिल के पास से।

आये दिन मेरे पास गुजरते है वो पल।

होती है बैचेनी थोङी होता है गम थोङा, होती अजब गुदगुदी।

होता अलग अहसास, झुमता है मन, घुमता है मन,

रहता बैचेन अजब जब याद होते वो पल।

क्या दिन थे वो क्या थे पल।

क्या गजब घङी थी, क्या गजब था अहसास जब था मेरे दोस्त का साथ।

होती थी लङाई हमेशा, रुठना रहता हमेशा, मना लेते थे फिर से,

घुमने जाते फिर से, वो लुका-झुपी खेलना वो सहद तोङना।

वो निकल पङना अकेले घुमने, निकल पङते साथ सभी।

चिढ़ना-चिढ़ाना चलता रहता खाना-पिना चलता रहता।

क्या मजा था आता जब होते दोस्त मेरे संग।

स्कुल में जाते हल्ला होता टिचर से भी झल्ला होता।

भाग जाते आधी में जब नहाने और कुएँ वाले से झगङा होता।

घर जाने पर डाट पङती पर फिर से वही राह होती।

याद आते हैं अभी भी वो पल जब बचपन था संग हमारे।

अब दोस्त है जवान है हम भी जवान अब सब अकेला हूँ मैं।

और है साथ मेरे अकेलापन।।


-कवितारानी।

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