बैठा हूँ / baitha hun

 बैठा हूँ 


कुछ भुले बिसरे लोगो में धाक जमाये बैठा हूँ।

खुद से हारा बेसहारा मैं आग जलाये बैठा हूँ।


अँगारों से खैलता आँखों में शोले सजाये बैठा हूँ।

मन से हारा लकङहारा मैं शाख जमाये बैठा हूँ।


वो आँख का तारा मन का मारा जग बिसरा बैठा है।

खुद से हारा जग में प्यारा अपनी दुनिया सजाये बैठा है।


तपती जमीन छोङ बर्फ में जलता हँसता वो खैलता है।

खिलती जन्नत हॅसता वो अब सहारा सा लगता है।


सोये सपने दूर अपने अपने जग को निहारता बैठा हूँ।

मन में उमंग लेकर तरंग सब को माफ कर बैठा हूँ।


नींद के मांदे रुप से आँधे आते जाते लोग देखता हूँ।

अपनी जन्म भुमि से जुङा में अपना आज देखता हूँ।


कुछ आशाओं संग, कुछ लेकर उमंग में साज सजाये बैठा हूँ।

खुद को बुलंद करके अंग में राज राज छुपाये बैठा हूँ।


संग सबका पाकर रंग अपना में बात बनाये बैठा हूँ।

भुल दुख अपने लेकर जीवन सपने में आग लगाये बैठा हूँ।।


-कवितारानी।

टिप्पणियाँ