बस कुछ दिन की मजबुरी है / Bas kuchh din ki majboori hai
बस कुछ दिन की मजबुरी है।
अपनी किस्मत अपनी साँसें।
बनते बिगङते रोज निभाते।
चलती रहती अपनी बातें।
होती रहती नई सौगातें।
बस यही जिन्दगी और मजबुरी है।
गुजरते दिन बैठोर जिन्दगी है।
यादों की अब जीवन से दुरी है।
बस कुछ दिन की मजबुरी है।
बस कुछ दिन की मजबुरी है।।
यादों से बिसरा हो जाऊँगा।
खुद से जुदा हो जाऊँगा।
आऊँगा ना लौट यहाँ फिर मैं।
अपनी दुनिया नई सजाऊँगा।
खोज में रोज मुश्किलों की सुली है।
देख रहा हूँ कल को मैं।
बस कुछ दिन की मजबुरी है।
ये कुछ दिन की मजबुरी है।।
आज आँख से आँसु दुर है।
घुटन सा जीया दुर है।
मन की मनमानी दुर है।
तन की मजबुरी दुर है।
साँसों की टकराहट दुर है।
जीवन एक सार सुरुर है।
बस यही देख कहता है।
बस कुछ दिन की मजबुरी है।
बस कुछ दिन की मजबुरी है।।
-कवितारानी।
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