मैं रोज नये सपने बुनता हूँ / Main roj naye sapne bunta hun
मैं रोज नये सपने बुनता हूँ
मैं रोज बनता बिगङता।
उठता-गिरता,
चलता, रुकता हूँ।
मैं सपनें आज भी सुनहरे कल के बुनता हूँ।।
आज भी मेरा मन वैसा है।
था कङवा बचपन जो,
तन आज भी वैसा है।
मैं आज भी इस आज को बदलना चाहता हूँ।
मैं रोज नये सपने सजाता हूँ।।
वो मखमल सा बिस्तर आज भी दुर कहीं।
दुर है आज भी महल मेरा वो।
आज भी प्रेम पिपासा खाती है।
रोज रात आज भी किसी की याद सताती है।।
मैं अपनी राहें खोजता फिरता हूँ।
मैं आज भी सुनहरे सपने देखता हूँ।
टुट-टुट के बिसरा सा मैं।
मन-ही-मन अकेला मैं।
भीङ मैं भी सुकुन खोजता हूँ।
मैं रोज नये लोग चुनता हूँ।
मैं रोज नये सपने बुनता हूँ।
मैं रोज नये सपने बुनता हूँ।।
-कवितारानी।
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