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व्यस्त हूँ / Vyast hun

  व्यस्त हूँ हूँ व्यस्त बहुत अपनी धुन में, पीस रहा में अपनी धुन में, दिख रहे बदलते नकाब, चढ़ रहा है दुनिया का शबाब।। जोर आजमाइशें मेरी चरम पर, थक रहा हूँ मेरी बहस पर, सात कोई-कोई है दर्शक, कोई नहीं पथ प्रदर्शक।। दीन हीन आते हैं, देख मुझे समझाते हैं, सम्पन्नों को मेरी समझ ना भाती, आती जाती ईर्ष्या जलाती।। भाई खाई में ही है अटका, छोङा साथ पूरा भटका, जग बदनामी कर मुझे लजाता, पास बताता दूर ही पाता।। तात तात होता अनजाने ही, जाने किस बात पर होती चिढ़, रीङ बने जो रोङा है, मेरे पथ का ये भी फोङा है।। हूँ अस्त होता किशोर मैं, जीवन के हूँ शौर में मैं, कहूँ ना तो भी सब सुन रहे, कुछ नजदीकियाँ कुछ दूरी चुन रहे।। करता स्वागत साथ वालों का, दूर जाने वालों को सहर्ष धन्यवाद कहूँ, व्यस्त हूँ अपने काम मुकाम में, व्यस्त रहूँ जीवन और विकास मैं।। -कवितारानी।

जोर आजमाईशें / Jor aajmaishen

जोर आजमाईशें कुछ सीले हुए हैं, पर अब कपङे नये है। खुद निर्णय लेता हूँ, सपने मैं संजोता हूँ। आजमाइशें खुब हैं, तकदीर में दरारें बहुत हैं। रोक लेता खुद हूँ को, आँसुओं की धार है। जीवन मझधार है, क्या ही कमाया मैंने है। क्या खोया है, पास नहीं कुछ भी। बस सपनों को पिरोया है, जोर आजमाइशें बहुत है। क्या मुझको लेना है, अपनी मिट्टी में दफन होना है। क्या किसी को देना है, क्या ही किसी से लेना है।। कहता जमाना मुझसे, कहता अपनी बातें। मैं मुरख मान जाता, कहता अपनी सुरत। बदल गई है सुरत मेरी, नयन नक्षत्र भी बदले हैं। जोर आजमाइशें जिन्दगी, क्या मुझको लेना है। अपनी ही जमीन पर पङा, मैं अधूरा सा हूँ खङा।। कोई मुझसा ना मिला, हूँ अकेला ही खङा। जोर आजमाइशें बहुत, अँधेरा है घना। शौर सब तरफ है अब, ्अब शौर मन का घट रहा। किस घङी हो मरा, आज लुटा पङा। जोर आजमाइशें बहूत, हाथ पैर मार रहा। किसे कहूँ अपनी बात, अपनी बात पर अङा।। चलने मैं देता नहीं, चलती नहीं मेरी कहीं। आँख से जो गिरा, मोती ही था बना। कसमकश है जिन्दगी, जिन्दगी है जुआ। जोर आजमाइशें कई, कई दुखों से अङा। कौन मेरा है यहाँ, कौन पराया है यहाँ। कौन कहे अपना म...

वो दुल्हन / vo dulhan

  वो दुल्हन अँखियन सुरमा, माथे बिंदिया, होंठो पे मुस्कान ले। ओढ़ चली चुनरिया, बिटिया चली नये संसार में।। मधुर मुस्कान, गालों पे लाली, चली छोङ अपने रिश्ते ये। बिटिया रानी चली अपने नये संसार में।। माँ का आँचल, वो आँगन, खैली थी जो बचपन से। छोङ चली पिछे जैसे हो कोई ये याद रे।। अँखियन सूरमा, माथे बिंदिया, होंठो पे मुस्कान ले। ओढ़ चुनरिया माथे, बिटिया चली ससुराल में।। कौन सा आँगन भाये, कौन दुलारे, कौन बुलाये प्यार से। छोङ चली जो बिटिया अपने बाबुल का संसार रे।। आँखों में पानी, गालों पर छिल-छिल निशान है। ये बिछुङन की घङी बङी दुखदायी है। माँ का आँचल याद करे, रोये-घबराये ये। अपनी सारी यादों को समेट चली नये संसार वे। रीत बुरी या प्रित बुरी गाये माँ-बाप ये। सब छोङ जाना होता जीते जी ये कैसा माया जाल है। अँखियन सूरमा, माथे बिंदिया लाल चुनरिया ओढ़ के।  बिंटिया चली अपने नये संसार में।। -कवितारानी।

बदला रुप / badla roop

  बदला रुप मुस्कान सजी होंठो पर, आँखों में गम छिपाये। सजी संवरी दुल्हन बन, मन का भार छुपाये।। सामने आते ही आह सी धङकन होती है। दिखती हॅसती, मस्काती सी, अकेले में रोती है।। काली घटायें कैश संवार कर इतराती है। काली छाया नैन पर दिख कर राज बताती है।। सेर सपाटा करती आदेशों पर चलती वो। मन ही मन मनती आवेशों पर जलती वो।। जग की जगती जोत बनी धधक रही अर्न्तमन को। ऊजाले में चमक रही अँधयारे को अन्तर्रंग कर वो।। आभा भौर सी बदल गई बनी दुपहर धूप अब। आधा जोर ही कर रही हूई सुहागन रुप अब।। खो गया योवन, जोगन अब जग की भीङ है। सो गया ऊजाला सारा सपने अब धुमिल है।। ओढ़ मुखौटा सति सावित्रि जग का बोझा अब। मोङ जीवन अति विचित्र रोज का रोजा अब।। आशाओं की छोङ डोर अब सपने थोपे जाते हैं। राग आता नहीं भौर, अब अपने थोपे जाते हैं।। जीवन डगर अगर होती ना, तो सार बदला होता। भार अगर फेंका ना होता तो आधार और होता।। सबकी सोंच, सोंच सबकी अब किया है वो भरना है। रोज का रोना भी है, अब हॅस के मनना भी है।। बदला है लिबाज, परिवेश, देश भी बदला है। एक टक नजर केवल सोंच रही, मन भी बदल रे।। -कवितारानी।

आगे-आगे देख होता है क्या / AAGE DEKH HOTA HAI KYA

  आगे-आगे देख होता है क्या हो गई सुबह अब जग तू जा। देख सूरज ने भी दिखाया है तेवर आ। भूल रात अंधेरा अब, सवेरा जग जा। हो गई खता अब जाने दे जा। आगे-आगे देख होता है क्या।। नम आँखे होगी, बातें होगी, मुलाकातें होगी। देख तुझे साँसे कभी आधी-आधी होगी। रोती रहेगी तन्हाई भीङ में मुस्कान। होना है जो होता है तू भी भूल जा। आगे-आगे देख होता है क्या।। आँखो पर काजल होंठो पर हो लाली। खाली थी गोद अब बैठी होगी लाली। काली-काली परछाई बतायेगी दर्द है क्या। नकली सी मुस्कान सुनायेगी टिस है क्या। परवाह जो की तो तेरी भी होगी खता। आगे-आगे देख होता है क्या।। खता हूई थी, बेरहमी हूई थी, सताया था कितना। भाव खाये थे, रोज रुलाये थे, अब दूर ही जा। आने ना दे, ना सुनना कह ना ना। जो हो रहा उसकी कमी है वो वही वजह। आगे-आगे देख अब होता है क्या। आगे-आगे देख अब होता है क्या।। -कवितारानी।

आज बस जीते है / Aaj bas jeete hai

आज बस जीते है जैसे घटायें काली बारिस की, शीत लहर शरद ऋत की, फुल बहार बंसत की, हसीन वादियाँ कश्मीर की, ठण्डी छांव गुलमोहर की, तु आ जाती है पल-पल को, महका जाती है कण-कण को, भर जाती खाली पलकों को, नम करती सुखे गालों को, जगाये रखती काली रातों को, वो पहर बीत जाते हैं, लम्हें फिर सताते है, राह एक टक नयन रह जाते हैं, हर पल धङकन बढाते है, घङी की सुई चुबाते है, एक आस फिर आती है, जैसे नई पहर बुलाती है, भौर का तारा देखने को, पुरब ऊजाला होने को, पश्चिम अंधेरा हटने को, रात काली कटने को, पल-पल गिरने रहते है, तील-तील कर जीते रहते हैं, सबसे कहते रहते है, हम बस आज को जीते है, कल को बस पीते है, आज बस जीते है।। -कवितारानी। 

सफर साथ / safar sath

  सफर साथ आशाओं का थाम दामन चलते रहना है। कोई दे साथ या ना दे बढ़ते रहना है।। एक मुकाम पर आकर ठहरा सा हूँ मैं। एक रब भरोसे जी रहा हूँ मैं।। दोस्तों से खुलकर विमर्श किया बात कही। खुलकर अपनी ही अपने आप ने खिल्ली की।। घर-परिवार वालों के बङे बोल-बोल रहे नाम के। दो पैसे सहायता मांगी तोल पङे घोल-घोल के।। अपना मान अपना दर्द बताते रहते थे। अपनों ने मान ना रखा और पीठ पिछे से सताते हैं।। कैसे बंधंन जग रे तेरे अपना शब्द बस नाम का । नाम होने पर भी जग जपता भजन पैसों के नाम का।। एक विनती और प्रबल बनके मांग रहा हूँ आज। इतना बङा औहदा देने पैसे देना याद दिलाऊ तन इन सबका आज।। बदला नहीं, बदली इनकी फितरत बता दूँगा एक दिन। चल रही जिन्दगी चली तो मुकाम वो पा लुंगा एक दिन।। अभी हिम्मत जुटा-जुटा के काम को करना है। जब तक कर सकू नेक काम वो कर सकू।। थकना नहीं, रुकना नहीं, नहीं चुप रहना है। इस जीवन का आधार दर्द तो कैसे भी हो सहना है।। एक-एक कर सबके चेहरे सामने आते रहते हैं। भोले मन हम जाने क्यूँ घबराते हैं।। एक रास्ता, एक सफर, मंजिल एक शिखर मेरा। जो सिख रहा जीवन भर वो अनुभव ही फिक्र मेरा है।। -कवितारानी।

राही भ्रमित / Rahi bhramit

  राही भ्रमित है अंतर मन में जाल फैला, कोश रहा तन जीवन को। कितना दुर्बर है सहन करना, मन ही मन की मजबुरी को।। दर-दर भटक रहा है, पथिक अपनी मंजिल को। कितना कठिन है हासिल करना, पथ से पथिक की धुरी को ।। पल-पल कर क्षण बिते हैं, गीन रहा तन घङियों को। कितना मुश्किल है सह पाना, टुटे मन के फेरों को।। चेहरा-चेहरा देख रही है, आँखें अपने प्रियतम को। कितना मुश्किल है कह पाना, कौन छिपा मन के कोनों को।। छनक रही है पायल सुन रही कानों को, कौन घङी बित जाये मिल नहीं रही मंजिल राही को।। -कवितारानी।

मैं व्यस्त / main vyast

  मैं व्यस्त हूँ पूर्वांचल में व्यस्त अपनी ही धुन का धुनी मैं। ताजगी की सांसों को लिये हूँ मधुर फिजाओं की खुशबु सी भूनी मैं।। आवाजों की आवाजाही है, आवाज अन्तर्मंन कराह कहीं। धुनों में बटा हुआ हूँ, आगाज बर्हीमन वराह राही मैं।। किस ओर मुख करुँ, हर ओर महक है फैली सी। धरा काली, धूसर है, हर ओर महक है, धूल फैली सी।। मृगमरीचिका से खुद ग्रसित, लक्षित अपने राह को। मार्गदर्शक सा चल रहा, पीङित कर अपने आप को।। था पश्चिम अस्तांचल सा रवि फैला अपने आप में। दुर निगाह तकता था रवि होता अपने आप में।। आवाज अंतिम छोर से आती रहती अपने आवेश में। नित नीर नयन बहते करते रहते अपने आवेग में।। नियमित, संयमित रवि उदय पूर्व की बन आवाज ये। कथित कथनी कवि लय सूर्य की बन आवाज ये।। -कवितारानी।

हाय रे परीक्षा / hay re pariksha

  हाय रे परीक्षा कैसी माथापच्ची है। कैसी ये दुविधा है। अभी की पढ़ाई शुरु, अभी ही परीक्षा। हाय रे । परीक्षा। हाय रे। परीक्षा। ना कहीं आने देती। ना कहीं जाने। डर के मारे मन जाते बहाने। सुबह को उठना, आधा खाना। जल्दी से पढ़ना। और स्कुल जाना। किताबें पढ़-पढ रहा मारा। ढाई घण्टे में मैं थका हारा। हाय रे। परीक्षा। कब खत्म होगी। फिर क्लास होगी। फिर मस्ती होगी।। -कवितारानी।

शिक्षा खोई हुई / shiksha khoi hui

  शिक्षा खोई हुई अहमी, दंभी, पांखडी ज्ञान भरे जो गुरु दिखते हैं। अपनी होङ में, तेज गति से दौङते हैं। इन आज के मास्टरों मे लगता है शिक्षा सोई हुई है। हर दिन अपने आलाप में दिखते हैं, शिक्षा खोई हुई है।। जो ज्ञान सागर पढ़े-सुने-देखे कहीं। जो महानता का आवरण ओढ़ बैठे रहते कहीं। आज के विध्यालयों में खोजता मे ज्ञानवान ही। और लगता है सब नौकरी वाले, इनमें शिक्षा खोई हुई।। शिक्षा का सार पता ना होता इनको। ज्ञान का आधार पता ना होता है। दुसरे प्रतिभावान को गिराना लक्ष्य इनका होता है। लङने का ही इनके मन होता लगता है।। मन के मारे, मन के हारे सारे ये। अपनी छवि सुधारने को अभिनयी लगते ये। इनको नहीं शिष्यों की पङी कहीं। इनमें लगता है वास्तविक शिक्षा खोई हूई।। भावी भाग्य के निर्माता सारे ये। अपने आलाप गाते रहते है ये। किसी की जो ना सुनने वाले है। इनमें नैतिकता कहाँ हो सकती है।। -कवितारानी।

प्रतिभाओं की किसे पङी / pratibhao ki kise padi

  प्रतिभाओं की किसे पङी जहाँ चापलुसी ही ज्ञान हो, चमचागीरी अभिमान हो। वहाँ काम और संस्था की किसे पङी, वहाँ प्रतिभाओं की किसे पङी।। जहाँ स्वार्थ सिध्द कार्य किये जाते हो, नमक से ज्यादा हरामियों की गाई जाती हो। हर वक्त अहम् और स्वयं का मान हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ज्ञान हो।। जेब जहाँ भरनी हो, कथनी करनी में भारी अंतर हो। तानाशाही ही जब करनी हो, फिर प्रतिभाओं की क्या करनी हो।। अकङ में ज्ञान ज्ञात ना हो पाता हो, अच्छे काम को नकारा जाता हो। मिलने वालों को भरा जाता हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या करना हो।। काम का अर्थ फिर बस काम रहे, व्यर्थ ही अच्छाई को काम मिले। बेवक्त फिर सुनना जब पङे, वहाँ प्रतिभाएँ क्या करें।। जंगल का राज भारी है, जो चिखे वही सबसे भारी है। आलसी का जहाँ बस मौज हो, प्रतिभा रहकर भी वहाँ क्या करें।। जहाँ अज्ञानता आनन्द बन गई हो, समझदार होना जहाँ मुर्खता हो। मुर्खों को पुरस्कार हो, वहाँ प्रतिभाओं का क्या ही हो।। हर वक्त प्रतिभा को जब टीस मिल, प्रशंसाओ को बस रीस मिले। हर्ष पर विषाद जिससे फैल जाये, प्रतिभाएँ ऐसी जगह कहाँ रहे।। -कवितारानी।

माॅडर्न शिष्य/ modern students

माॅडर्न शिष्य ध्यान हीन, ज्ञान हीन, दिशा हीन, वाचाल, कुचाल भरे। अमर्यादित, स्व बाधित, दंभित मति लिए, पापी है। अवज्ञा करते, अवहलना करते, स्वार्थ की बात करते हैं। हर बात पर कुतर्क, कहते ये हम माॅडर्न हैं।। शिष्य कहूँ, आधुनिकता वाले या कहूँ अहमी पीढ़ी है। ज्ञान पीपासा दिखती नहीं, ये अज्ञानी अभिमानी है। मैं गौरव चाहूँ बांटना, सिखाना चाहूँ ब्रम्हाण्ड इन्हें। पर माॅडर्न शिष्य को पाकर लगता नहीं इन्हें मेरी कमी है।। भाषा हीन, आशा हीन, निशाचर प्रेमी, मोबाइल के आदी है। आभा हीन, प्रसादन लीन, कृत्रिमता लिए, वास्तविकता के वैरागी है। दिखावा करते, प्रतिस्पदा में मरते, छल के पारखी है। अस्थिर चरित्र, मौलिकता खोये कहते हम माॅडर्न है।। क्षमा नहीं, क्रोध में ही, आवेश में विचरते हैं। अपने आप को विद्वान बखानते. ये ज्ञान हीन मरते हैं। समाज को भ्रमित कर, माता पिता का वैभव हरते हैं। इन माॅडर्न शिष्यों को देख, लगता है हम पिछङ रहे हैं।। -कवितारानी। 

अब / Ab

  अब  महिने बीत गये हैं, परायी सी लगती अब। देखने को जी होता भी, पर मन को चिढ़ती अब। चेहरे पर वो नूर नहीं, खोयी सी अपने में तू। आँखों में सूरमां भी, पर भाती नहीं अब। माथे पर बिंदिया है, गले में मंगलसुत्र अब। मेरी कहूँ कैसे तुझसे, अहसास ही नहीं होता अब। स्पर्श अब औझल है, प्रेम रस खोया सब। मधुर बातें दबे पन्ने सी, भूले बिसरे लम्हें अब। याद तू आती नहीं, पलकों से जाती नहीं। देखना अब भाता नहीं, देखे बिना रह पाता नहीं। तुझसे जुङे लोग टकराते हैं, मिलने को उन्हें पैर डगमगाते हैं। किसी पर अब यकिन नहीं, तेरी कोई उम्मीद नहीं। पल-पल एक साये सा, रहता है यादों का पहरा। रख खुद को व्यस्त मैं, जी रहा हूँ अब मैं।। कल के कुछ किस्से हैं, दर्द के मेरे हिस्से हैं। रोती मनाती तू आयी भी, सिसकी भर इतराई भी। वही तरिका था लङने का, वही सलिका था लङने का। फिर मैंने बात ना की, अब तेरी यादों की बात ना थी। परायों सा तेरा जिक्र है, अकेले दूर तेरी फिक्र है। पागलों सी तू होना ना, गैरों सा मैं होना ना। आशाओं के द्वीप पर, मैं बैठा अपनी रित पर। मुझमें कमियाँ कई पनपी सी, तुझमें कमियाँ कई दिखती सी। अब कोई बात नहीं, ते...

Saffocation

 Saffocation It's all about life, Suffocation on temptation,  Temptation of desired things. And suffocation of your love, It's all about my pain, Rain fills in eyes. I do believe on my God, He will be mine, The suffocation of Heart, Hurt me all things of love, Your hugs and kisses, All about the future of us, And don't trust on me, And you left me forever in past. The time had past. And suffocated on the things of love. Your calls and massages, Still binds me like that. It's all about my soul. All about my love, You didn't stay with me. You're not in my fevour. Now you do cry for me. blame on me. And I say, It's all about your fault. And I suffocated feel by you. It's all about love things. -kavitarani1