किसे ढुँढते हो / kise dhundhte ho
किसे ढुँढते हो
मिला नहीं किसी ज्ञानी को सुलभ उसे ढुँढते हो।
मिला नहीं किसी विज्ञानी को कहाँ ढुँढते हो।
वो है जो मन में तेरे तन में तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो।
वो है जो कण-कण में पास आस तेरे उसे कहाँ ढुँढते हो।
जो सिर्फ देता है दाता बन वो है उद्दारक बङा महान्।
जो सिर्फ दया, प्रेम, करुणा माँगे उसे क्या तुम देते हो।
है अज्ञानी मानव उसका आशिष पाने को जुर्म की प्रार्थना करते हो।
है मुढ़ बुध्दि मानव अपमानित कर उसे दया की भिख मांगते हो।
करते प्रार्थना जिसकी धरती अम्बर बन पावन घङी में शुध्द हो।
करते ऋषि, संत महात्मा योग, दान, धर्म की नैकी हो।
मिले ना उनको आसानी से उसे तुम दबाव से माँगते हो।
पुजा खुद कर सको तो दुसरों पर उसे ताङते हो।
ये दिया उसका है अवसर देता वो गंवा रहे तो हो तुम फिर रोओगे।
जब देना होगा मन उसे जब होगा तोल तब तुझे।
महाज्ञानी है वो, महा दयालु है वो भक्तों के उध्दारक है।
अहिंसक है वो शुध्दता, क्षमा, दया, भाव के पारखी है वो।
उसे अँधेरे में रख हो तो ना कुछ काम फिर कैसे बुरे करते हो आप।
कृपा पा जाओगे उसकी राह पकङो।
ईर्ष्या छोङ मुर्ख से भी मिलता है ज्ञान क्यों फिर ज्ञानी से करे बैर।
है मानव छोङ मोह माया आलस्य का साथ क्या रखा है यहाँ रैन।
समझ अपने को और समझा औरों को हिसाब लिखते है सब वो।
राह आसान नहीं उसकी पर कठिन राह पर साथ है वो।
तो चल लेकर साथ उसे, साथ उसे, साथ उसे।।
-कवितारानी।
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