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कुछ बदला नहीं / kuchch badla nahi

  कुछ बदला नहीं होके लहरों पे सवार, अपनी कश्ती लेकर अपना भार। मैं हो आया जग के दो छोर, अपने मन के दुखङे फिर छोङ। आशाओं की लेकर गठरी साथ, आया मैं अपने घर अपने गाँव। कुछ मैं था बदला कुछ मेरा लिबाज, यहाँ कुछ बदला नहीं।। वहीं धूप भरा आँगन है, वही शौर भरी छत, टीन तरपाल। वहीं कुण्ठित मन के मटके हैं, वही जालसाज बैरी आस-पास। वही रुकावटें बन दीवार खङी, वही नकलची भौर ईर्ष्या के भण्डार। फिर नई सोंच बदलाव लिया आया, कुछ बदला नहीं जहाँ आज।। कैसी मानसिकता है घर कर बैठी, कैसे काटते दिन-रात। ना बदले मन को ये, ना बदल पाये घरों की दीवार। दिखावे में लुट गये घर, मन में भरा रहता अकाल। मैं भी दिन रात काट लूँ, क्योंकि कुछ ना बदला यहाँ आज।। एक सोंच लिये अपने विचार बांटे, विमर्श किया कल अपना मान। एक बात जगी मन में भलाई की, एक अच्छाई की करी बात। सुबह गई समझ भरी, शाम को शराब का वही हाहाकार। मैं बदला अपने आप में, दबा कहता कुछ बदला नहीं यहाँ आज।। ना छत वो नजर में भाती, ना नजर पंसद घर के बाज। चालबाज चाल चलते, बिगाङ रहे मेरी ताल। मैं अडीग अपने लक्ष्य पर फिर भी, चल रहा लेकर अपने साज। देख रहा बदलाव अपना, देख रहा कु...