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नव वर्ष- उमंग मिले / Nav varsh- umang mile

नव वर्ष- उमंग मिले सतरंग मिले, इन्द्र धनुष खिले। चहुँ ओर नव उमंग मिले। जाओ जहाँ खुशहाली हो। महके फिजाएँ जैसे बंसत हो।। बरखा संग हरियाली हो। सब ओर महकती होली हो। दुर मावस सा घोर अँधेरा हो। नव निशा जैसे रोज दीवाली हो।। खिली धुप तपन शीत हो, शुष्क, ग्रीष्म, शरद ऋत हो। स्वच्छ निर्मल बहती दरिया हो। शांत नयन मखमल ह्रदय हो।। स्वर गुंजन रस कोयल हो। मधुर मिठास रसना प्रौढ़ हो। शांत चित्त, कोमल लिहाफ हो। महकते उपवन में मधुमास योवन हो।। आभा यश किर्ति बखान गाती हो। सर्व सिध्दि, नव निधि प्राप्ति हो। जाओ जहाँ स्वकेन्द्र जग हो। प्रकाश मान बन समाज को रोशनी हो।। हर दिन खिले, नव माला बुने। सुन्दर लुभायमान जीवन बनों। नववर्ष पर कामना करें। आपका नववर्ष उज्जवल हो।। -कवितारानी।

बीते लम्हे, नव वर्ष आया / Beete lamhe, nav varsh aaya

बीते लम्हे, नव वर्ष आया फिर बीत गया साल देखो, फिर बीत गयी बात देखो, रहा नहीं साथ कुछ, रह गये जो जज्बात देखो। कहते हैं हम साल जीते हैं, अपनों संग दिन रात सीते हैं, काट देते हैं समय के साथ को, वास्तव में हम दिलों के जज्बात जीते हैं।  जा रहा है एक साल दो हजार पच्चीस भी, आ भी रहा है एक साल दो हजार संग छब्बीस भी, देखते हैं ये जाते हुए साल को कैसे भुला पाते हैं, नये साल का एक स्वागत गान आज से गाते हैं। मेरे रुठे, मुझसे ना मिलना तुम, मेरे छुटे लम्हें पुरे होना तुम, सपनों तक को राहें देना, नव वर्ष मांगु तुझसे हर्ष ही देना तुम। चलो आज को अच्छे से अलविदा कह दें, भुल जाये बुरे रहे जो लोग ओर लम्हे, याज रखे सिख जो दे गया है, आगे बढ़े लेकर नये  रास्ते। नव उमंग संग, नव वर्ष नव रंग हो, ईश्वर करे नव वर्ष शांत, संतुष्ट सुकून रहे, करे कृपा ईश्वर सब पर, अपनी नाव सन्मार्ग, उन्माद बहे।। -कवितारानी।

अहसास होता है कई बार / ahsas hota hai kai bar

  अहसास होता है कई बार अहसास होता है कई बार, कि कितनी तपन है सब ओर। कितनी ठण्डी हवाएँ भी टकराई है, वक्त का पहीया ऐसा दौङेगा, अहसास होता है कई बार। पता ही नहीं होता बैठे बिठाये साल खो दिया, कितने खाली लम्हें बैठे यूँ ही सब खो दिया। जैसे रहा ही नहीं कुछ मेरे पास, अहसास होता है कई बार। जाने कब से पत्थर दिल बन बैठा हूँ। सोंचता नहीं किसी के बारे में अब। परवाह नहीं होती खुद की ना दुनिया की। जब से चलने लगा हुँ गिरकर इस बार। अहसास होता है कई बार। अहसास होता है कई बार। कि खो दिया मैंने बचपन अपना। वो महफिलें वो यारियाँ भी खो दी मैंने। खो दी मैंने दुसरों की परवाह वाली आदतें। खो दी एक कोमल ह्रदय की यादें। बचपन की सारी सौगातें। वो टिस, वो जख्म, वो अहसास खोजने का अपना, वो किसी के साथ जीनें, मिलने का अहसास। अहसास होता है कई बार।। मिट्टी का बना था महक उठता था हर त्योहार, वार, करता नहीं एतबार इस बार, रहा क्या आज वार, निकल जाते है दिन, महिने, साल हर बार। -कवितारानी।

ये वक्त भी गुजर जायेगा / ye waqt bhi gujar jayega

ये वक्त भी गुजर जायेगा आयेगा अंधेरा फिर ऊँजाले के बाद, घङी की सुईयाँ फिर होगी लेकर नया सार। आयेगा नये दिन की पहर नये लम्हे लिये। नया साल होगा फिर एक याद। आज की करुँ बात तो आज मिट जायेगा। ना यादें होगी ना अँधेरा ऐसा। मन में बातें होगी जो होगा नया। कहनें को बातें चार है ये वक्त भी गुजर जायेगा होकर सार। गुजर जायेगी हाथ की रेंखाएँ रेत सी फिसलन लिए। सोंचते रह जायेंगे कितना सा था साल। ये वक्त भी गुजर जायेगा होकर सार।। -कवितारानी। 

भारी मन / bhari man

  भारी मन बोझ कई लिये, मन पर बोझ कई लिये। रवि अपनी धुन का चलने वाला, पर अभी है मन पर बोझ कई लिये। खुद को संभाल रहा है अभी, समाज को खो रहा है अभी। परिवार की अपेक्षाओं में उलझा, धर्म की नांव पर तरता। अभी लिये है सपने कई, विचारों को लिये है कई। मन पर है रवि के बोझ कई, मन पर है बोझ कई। मन के दुश्मन मेरे हैं बढ़ गये, कई बेवजह ही बैरी बन गये। अपना माना था जिन्हें भी, वो परायों से ज्यादा दुखी कर गये। कभी रोग में उलझा खुद ही, कभी दोष में उलझा खुद ही। कभी दुनिया की है सोंच मन में ही, अभी मन में बोझ ही।। ये बोझ मन के भारी । मन के भार में जी रहे हैं जी। भारी मन कह रहे यही। मन पर है बोझ कई, मन पर है बोझ कई। किसको अपना कहे, कहे पराया किसे। किसको सपना बताये, छुपाये किससे ही। है उलझन ही, है उलझन ही। और उलझनों का भी है बोझ कई। मन पर है बोझ कई।। -कवितारानी।

कल-कल / kal kal

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  कल-कल वो पल मैं क्यों याद करुं जो सताये मुझे, रुलाये मुझे। जो पथ पर ना ले जाकर भटका दे मुझे, भुला दे मुझे। आज मेरा है साँसे मेरी है। हर दम प्रयासरत बातें मेरी है। कौन कहता है कल नहीं आता। मैं तो कहता हुँ आज नहीं जाता।। जो गया है कल वापस ना आने को है वापस यहाँ। आया नहीं जो उसकी सोंचुँ क्यों मैं भला। आने वाला आयेगा ही। जाने वाला जायेगा ही। ये वक्त की रफ्तार है। रोक इसे सकेगा कोई नहीं।। फिर वो बातें आने क्यों दे मन में मस्तिष्क में। फिर क्यों करुँ कल-कल की चिंता मैं। ना कल का आज ठीक होगा। ना कल का आज जीना होगा। एक लय से आज जीया तो। कल ना याद होगा ना याद आयेगा।। वो बुरे कल का डर और निकल गया उसका भी गम। आज को ना भ्रमायेगा, जो आज ही जीता जायेगा। आज मेरा है साँसे मेरी है। हरदम प्रयासरत बातें मेरी है। मैं कल-कल मैं कलकल ना गाऊगाँ। कल-कल में आज नहीं गवाऊगाँ।। -कवितारानी।

वैचारिक मतभेद / vecharik matabhed

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  वैचारिक मतभेद मैं किनारे खङा अकेला सोंच रहा,  सोंच रहा खुद के बारे में और जमाने के बारे में। मैं खुद को अकेला पाता हूँ,  इस भीङ भरे जग में खुद को किनारे पाता हूँ। क्रांति का संदेश साँसो में भर कर,  मन को विचारों से लाद आता हूँ। सिखा ज्ञान बताता हूँ, और जग को जगाता हूँ। मैं उलझा ही जाता हूँ, मैं उलझ जाता हूँ। जो बखान करते ज्ञान विज्ञान का,  जो रोज अलापते अपनेपन की, जो नैतिकता के पुजारी है। जो मानवता प्रकृति के रक्षक हैं. वो सब मेरे विरोधी हो जाते है। वो सब मुझसे रुठ जाते है, वो मुझे निचा दिखाना चाहते हैं। वो मुझे गिराना चाहते हैं। मैं विरोध सहता और रुकता हूँ। सोंचता हूँ, विचार मंथन करता हूँ, कि आखिर क्यों मेरा उन्ही की बातों को अपनाने का विरोध है। फिर मैं पाता हूँ यो वैचारिक मतभेद है। वैचारिक मतभेद ऐसा है कि सुना ना जाता है। अच्छाई को कुचला जाता है, ईर्ष्य़ा से भर कर लङा जाता है। किसी की अच्छाई नहीं भाती है। किसी के व्यक्तित्व से लङाई हो जाती है। किसी को साथ ना सहा जा सकता है, बुरों के बीच कुचला जाता है। वैचारिक मतभेद मन भेद बन जाते हैं। आपसी लङाई का कारण बन जात...

लोग मतलबी सारे / log matalabi sare

  लोग मतलबी सारे स्वार्थ सिध्ध साथी सारे, मत के मद में अपनी गाते। अपनी ही आलाप सुनाना चाहते, कहते साफ अपने को,  पर मैं कहता मतलबी है सारे।। लोग मतलबी है सारे, साथ चाहते मतलब तक का। अपना बतलाते अपने स्वार्थ तक, स्वार्थ पुरा होने पर पुछते नहीं। अपने स्तर की ही कहते यही, वो अपने स्तर का है ही नहीं।। जब काम अपना बढ़ जाता है, मन में भाव अपनों का आता है। वो अपना-अपना रंग बताता है, बहाने सुना दीन हीन कहलाते हैं। जीवन में पङे  एक काम ना आते हैं।। अपने काम की जब बारी आती, सारे रिश्ते याद दिलाते हैं। लोग सारे उपकार गिनाते हैं, कैसे अपने जीवन को गाते हैं। लोग बस मतलब से पास आते हैं।। मतलबी दुनिया मे बाशिंदे यो मतलब तक ही साथ रहते। मतलब तक  ही बात कहते, मतलब तक ही काम करते, ये लोग मतलबी सारे।। अपनी कमियाँ उजागर ना करते, अपनी बातें दबाये रखते हैं। हमारी सारी बातें फैलाते, हमारी दुनिया में गिराते हैं, ये मतलबी लोग सारे।। दुर इनसे रहना है, अपना काम करना है, अपने हिसाब से रहना है, इनसे मतलब ना रखना है, इन मतलबियों से दुर रहना है।। मतलबी बुरा जल्दी मानते हैं, इनकी सुनों ना तो दहाङते ...

खुद में सिमट गया हुँ / KHUD MEIN SIMAT GAYA HUN

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खुद में सिमट गया हुँ अपने बचपन से निकल, अपनी जवानी में सिमट गया हुँ। आजादी के सपनों से निकल, अपनी वास्तविकता में सिमट गया हुँ। वैसे एक समाज लेकर बढ़ता हुँ मैं, पर लगता है आजकल खुद में सिमट गया हुँ।। वैचारिक क्रांति लिये हुँ, मैं दुनिया बदलने के ख्वाब सिया हुँ। मौका ढुँढता रहता आगे बढ़ने का और रुकावटों में उलझ गया हुँ। लेकर चलना चाहता था सबको साथ में, पर आज लगता है, खुद में सिमट गया हुँ।। क्या चाहता हुँ भुल गया हुँ, क्या मानता हुँ भुल गया हुँ। अपनी सीमायें बनाने लगा हुँ, अपने दिल की सुनने लगा हुँ।  कभी चाहता था सबको खुश करना, पर लगता है अब मैं खुद में सिमट गया हुँ।। बहुत कोशिशें कर ली मैंने, बहुत दुनिया की सुन ली मैनें। खुब भलाई के काम किये, और बदले में बस भुला दिये। मैं इन सबको ही तो याद करता हुँ, अब मैं खुद में सिमटा महसुसु करता हुँ।। जिससे कहो वो सुनाने लगता है, जिसे सुनों दबाने लगता है। अपनी कह दो तो चिढ़ जाते हैं, मस्त अपने मैं तो लोग जलने लगते है। फिर कैसे मन को शांत करता, मैं जानता हुँ इसी सोंच से अब खुद में सिमटा हुँ।। हाँ मन दुखी भी होता है, अपना रहे जग यही मन कहता है। सब द...

सुनी भाग-5 बाल विवाह / suni bhag-5 Bal vivah

  सुनी भाग-5 बाल विवाह आने वाला था परीणाम साल का, उसके पन्द्रह साल के अंजाम का, खुशियाँ आशा बन पलकों पर ठहरी थी, बचपन से सिखी बातें बह रही थी। कैसे-कैसे पढ़-पढ़कर यहां थे पहँचे, दौङ-भाग से गुंथे थे रेशे, अपने बालपन की बातों में बचपन था, किशोरी जीवन दहलीज पर था। शुरु हुआ था नव योवन वो, आभा से उसकी हर योवन खिंचता जो, खिंच रहे थे रसुखदार भी, ले बेङियां अँधकार की। एक आया सौदागर देह खरीदने, सौ टके सोने पर मौल रखने, अभी कच्चा था जो खान में, नजर जमाये था वो सामनें। अपने रिश्तेदारों को भेजा, समझाया बापु को और रोज टोका, हर जगह अब बेटी की सुनते-सुनते, बापु पसीजा मन को समेटे। समाज में सब किशोरियाँ परनी थी, तेरी बेटी कब परनेगी, कब तक तु घर रखेगा, कैसा बाप है क्या कंवारी रखेगा। हर जगह मां भी सुनती, मन मार-मार बेटी को चुनती, आने लगे बुरे ख्याल भी अब, क्या सच है जो जग कहता सब। ख्वाब लेकर सुखी संसार के, हॅसकर बार-बार गले लगाकर, बेईजी बेवजह बना ही डाला, समधन कर घर पर ढेरा डाला। बेटे की बात कम थी, बेटी की परवाह कम थी, एक समाज साथ चलना था, बढ़े होने का मान रखना था। एक दो बार मना किया, आना कानी कर बात...

सुनी भाग-4 विध्यालय में / suni part-4 vidhyalay mein

सुनी  भाग-4 विध्यालय में घुँघुँरु की मधुर धुन से, चहलकदमी के शौर तक, आँगन-आँगन से अब, विध्यालय की ढेळ तक। अपने गाँव की शाला में, जाती है रोज बन बाला ये, अक्षर ज्ञान से तुरंत परिचित, मधुर मुस्कान चिरपरिचित। प्रथम पाठ पुरा हुआ तेज से, द्वितीय में दिखा कुछ वेग से, तृतीय तक थी कुछ आनाकानी, चतुर्थ में नियमित हुई सयानी। पांचवी तक आते-आते, दिखा दिया ज्ञान मन भाते-भाते, सबकी बनी चहेती सी, कुछ औसत कुछ तेज सी। तिसरी-चौथी पंक्ति भाति, कभी कभार अंतिम पंक्ति हो जाती, प्रथम पंक्ति दुर्बर दिखी, शैतानी भी की पढ़ाई भी की। मधुर बातें ही अक्सर सुनी, वो बाला अक्षर की हुई धुनी, सब कुछ रट झट याद करती, सबसे पहले रहने को मरती। रोज तैय्यार होके जाना,  अपने जमें पर रोब दिखाना, दो चोटी में प्यारी गुङिया, मंजरी आँखों वाली वो भुरी गुङिया। कभी माँ कभी पापा आते, कभी भाई, बहिन ले जाते, छोटी थी अनजानी थी सुनी, आवाज देती कहती मेरी नहीं सुनी। अपने मन की रानी थी, जिद जब-जब उसने ठानी थी, चाॅकलेट पैसों से काम ना चलता, पापा की फटकार से मुॅह चिढ़ता। रोज समय पर काम करती, विध्यालय में आदर्श सी बनती, कोई श्रेष्ट जो उसस...

सुनी भाग-3 बाल जीवन / suni part-3 Bal jivan

सुनी भाग-3  बाल जीवन   सुदूर शहर से उपवन किनारे, सरिता जिस गाँव के चरण सँवारे, विध्यारागी चहल आँगन में, जब सुनी चित्कार घङी मंगल में। अनुजा सबकी विशाल कुटुम्ब में, दौङती फिरती आँगन-आँगन में, वो खैल-कुद में अग्रगामी थी, कहा कुछ भी तो, सबने सुनी थी। सुंदर मुख तेज प्रतापी दिखता, चंचल, चपलापन उसपे जचता, लाङ प्यार ने आजादी दी, हर बात उसकी सबने सुनी थी। धुल-मिट्टी से फर्क ना पङता, गुड्डे-गुड्डी से बचपन बढ़ता, गाँव सखाओं मे सबसे प्यारी थी, हर घर में जाती जहाँ उसकी सुनी थी। अपने ज्ञान का परचम लहराती, अपनी धुन में गाती जाती, कोई नहीं पराया लगता, उसे बस हरदम मौज जमता। हुङदंग से दंग करती थी, हमेशा सबसे लङती थी, आँसुओं से लगाव था जैसे, समझती नहीं थी कोई समझाये कैसे। जैसे-जैसे साल गुजरे, शाला में जाती अब पढ़ने, सारा सार अपने मे रखती, पढ़ने में ध्यान रखती। घर आते कुएं पर जाना, कुआँ भरा तो कुएँ में नहाना, नदी चढ़ी तो कलाबाजियाँ की, बचपन में खुब शैतानियाँ की। पेङ पर चढ़कर कुलाम खैली, आम, अमरुद पेङ पर तोङे, चोरी-चुपके शहद भी तोङे, नेता बनी तो अपनी टाली। हमजोली की बना के टोली, गाँव बसा मिट्टी क...

सुनी, भाग-2 मुलाकात / suni, part-2, mulakat

सुनी,  भाग-2 मुलाकात मैं तुफानों को समेट, पुरब से पश्चिम तक होके, देख आया जीवन बयार सारी, अब मध्य में पहाङों की बारी। प्रथम दृष्टा मनोहर थी, आभा उसकी नव योवन सी, श्वेत वर्ण कंचन थी, अनंत जीवन वो सुनी थी। शर्माई कुछ-कुछ घबराई, पास आकर बात बढ़ाई, मुलाकात में कुछ खास ना था, पर जीवन का यह मोङ था। मुङ जाती अपनी धुन में, स्वार्थ था अपने गुन में, कर्तव्य पथ पर अटल दिखी, ज्ञानी सी थी पर नव सीखी। हर बात पर अपनी दात लेती, खुलकर हॅसती मन हर लेती, रहती ना उसकी कहीं कोई बात अनसुनी, वो पहली मुलाकात में लगी सुनी। एक शब्द में उसका अंत नहीं, बातों में उसके सार कहीं, हार नहीं मानती थी, खुद को हमेशा संवारती थी। अंजन नित नयन करके, आइने को रंग करके, आइने को आते निहारती थी, बार-बार खुद को संवारती थी। कल का मैल आज ना भाता, जो भी पहने खुब सुहाता, आता ना था वस्त्र विधान भारी, पर अपनी मनमर्जी में कभी ना हारी। केश सज्जा की निपुण नारी, साङी पहन थी सबकी प्यारी, शाला उत्सव की वो गाथा, उसके बिना प्रांगण सुना कहलाता। हर चीज पर अपनी राय रखती, अच्छी सिख को ही तकती,  तकते सब नयन भर-भर कर, रोकती नहीं सिर चढ़ कर।...

सुनी ; भाग-1 लेखक की प्रेरणा अभिव्यक्ति / suni - Introduction; part-1

सुनी ः भाग-1  लेखक की प्रेरणा अभिव्यक्ति  (एक अनसुने संघर्ष की कहानी) यह कहानी बाल विवाह कुरुति पर आधारित है, ईसमें एक बालिका के जीवन चरित्र को प्रदर्शित किया गया है जो अपने समाज, परिवार, रितियों की परवाह किये बिना बढ़ती है। क्र. सं.      विषय 1.     लेखक की अभिव्यक्ति 2.     मुलाकात 3.     बाल जीवन 4.     विध्यालय में 5.     बाल विवाह 6.     सामाजिक जीवन 7.     महाविध्यालय 8.      शिक्षक - प्रशिक्षण 9.     स्नोत्तकोत्तर 10.     परिवारिक दबाव 11.      धर्म अर्थ संकंट 12.     संघर्ष 13.      प्रेम बंधंन 14.     विरह 15.     व्याख्याता 16.     दोस्ताना 17.      प्रत्यक्ष 18.      उपसंहार भाग - 1 लेखक की प्रेरणा अभिव्यक्ति     हम वर्तमान में इक्कीसवीं सदी के भारत में अपने-अपने अक्षांशों-देशांतरों में बैठे जहाँ आधुनिक मानवीय जीवन का आनन्द ले रहें हैं...

Tomorrow

Tomorrow Today is mine, I take it fine, I fall everything on time, Happiness got roll. Everything feels in mind. Will it be lost tomorrow? Answer troll at all. No worry, How I live. Everything I do believe. I feel happy in alone. The corner of my home. Call me to take some wine, I feel there much fine. Nothing I have then. Nothing in my mind. leave me alone. I don't think about tomorrow. Who's know about tomorrow. How will be my tomorrow! -kavitarani1

मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं / Main aaj ko jeeta hun kal ka pta nhi

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मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं पल भर के लिए रुकता हूँ, हॅसने के लिए। जो ठोर मिल जाये मुझे समझने के लिए। मैं कल पर शिकवा नहीं करता रोने के लिए। साथ लिए चलता हूँ सपने, आज के लिए। सब कहते हैं कल की सोंच भी लिया करो तुम जरा। मैं कहता हूँ, मैं जीता हूँ आज को कल का पता नहीं। ना सुनहरे रास्ते कल के मन भाते हैं। ना आभा नयी सुबह की जगाती है। रात के तारे, दिन के फव्वारे सारे। समझा नहीं पाते आज को हमारे। कल की सोंच आज बिताया नहीं करता अब। मैं आज जीता हूँ कल का पता नहीं कुछ। आखरी कुछ सालों तक, हर महीनें, हर दिनों में मैंने। कुछ परखा है अपने आप को, समय को, हालातों को। बहुत कुछ रह जाता है हर समय आज को। जब-जब मैंने सोचा है जीना है कल की बात को। समझ गया हूँ जीवन के एक आयाम को। वक्त वही बहतर है जो देता निरंतर काम को। छोङा ना कुछ कल पर अब मैंने जो आज हुआ नहीं। मैं आज जीता हूँ क्योंकि कल का पता नहीं।। -कवितारानी।

एकान्त में / akant mein

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एकान्त में कोई कहे कुछ ना, सुनता ना मन का। मैल हुआ ना फिर भी शांत ये, बैठा हूँ आज भी एकान्त में। शौर सब और है, बैठा एक ठोर मैं। आती ना आवाजें, सुनने को बातें। कलरल फिर भी जैसे कोई बाढ़ है। अजरज में हूँ एकान्त मेैं।। गली-गली भटका, भीङ में भी अटका। मिला कोई कान्त वे, रहा फिर भी एकान्त मैं। जाती नहीं यादें, मिटती नहीं बातें। बदलता नहीं मन का मान रे। सुनता नहीं किसी की कान्त ये। हुँ आज भी एकान्त में।। बदली आती जाती, शौर गर्जन गाती। मानसुन की होती रहती फुहार ये। बुझती नहीं नयनों की प्यास रे। रहता फिर मैं एकान्त में।। चुभन दम भरती आहें आग करती। भरती है आहें आवाज ये। करती रहती अशाँत तन ये। हुँ आज भी एकान्त में।। सुनता ना मनकी, में गलता रहता बन मिट्टी। होती ना शाँत, हुई जो भ्रांत है। आज भी हूँ, मैं एकान्त में।  आज भी हूँ एकान्त में।। -कवितारानी।

ना मिलना / na milna

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ना मिलना वो प्रित ना मिलना मुझसे, वो शीत ना मिलना मुझसे। जो टिस जगाये मन में, जो दर्द भर जाये तन में। वो रीत ना मिलना मुझसे, वो मीत ना मिलना मुझसे। जो रात जगाये वर्ण से, जो नींद भगाये नैन से। वो जीद ना मिलना मुझसे, वो हठ ना करना मुझसे। जो छल कर जाये पल में, जो भ्रम भर जाये जीवन में। वो हल ना मिलना मुझसे. वो पल ना मिलना मुझसे। जो प्रश्न भर जाये मन में, जो जीवन तर जाये क्षण में। वो जीत ना मिलना मुझसे, वो खुशी ना मिलना मुझसे। जो सुकून ना भर पाये तन में, जो दिल ना भर पाये मन में।। -कवितारानी।

अश्रुओं की धार / ashru ki dhar

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  अश्रुओं की धार दो धार छलकते पैमानें से, अटके हुए मेरे मयखाने से। आ जाती थी रुक-रुक के फुहार, मेरे नयनों की अश्रुओं की धार।।   पथ उनके टेङे मेङे थे। वक्त से रहते बङे बेङे थे। बेवक्त कर जाती थी प्रहार। मेरे नयनों की अश्रुओं की धार।। मैल मन का गहरे तल से। अधुरे रहे अरमानों के छल से। छुट चुकी है मन की जो बहार। ले आती है अश्रुओं की धार।। गंगा जमुना सी पवित्रता से, मन की शांत सुनेपन से। करती रहती आवाज हर बार। जब आती है अश्रुओं की धार।। पैमाने ये खाली ना होते। बिन मतलब कल को रोते। बने रहते निरंतर निर्झर अपार। मैंरे नयनों के अश्रुओं की धार।। आ जाते हैं बह जाते हैं रह जाते हैं। पलकों पर सिंचते गालों को मन पर करके वार। भर देते मेरे मन के हर द्वार। मेरे अश्रुओं की धार, मेरे अश्रुओं की धार।। -कवितारानी।

दो गज जमीन / do gaj jameen

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दो गज जमीन दो वक्त का खाना हुआ,  सोना हुआ छठवे पहर को। लगा रहता अपनी धुन मैं, हरना हुआ जो अपने खुद को। कहता किससे दो पग नाप ली मैंने। पैरों तले थी जो दो गज जमीन। मेरी नहीं ना तेरी थी। खुनी हुई जो पहरी थी। किसी का कोई साथी ना था। मेरे पास कोई मेरा ना था। तब भी अकेली कुटिया थी। वो मेरे पैरों तले। दो गज जमीन ही थी। आज भी आगे बढ़ता हूँ। रहता हूँ खुद का खुद में मैं। सुनता हूँ सबकी बातें। कहता हूँ अपनी मैं। रहने को रोटी कपङा हो। मकान के लिए खुद हो। दो गज जमीन।। -कवितारानी।

शीत वही / sheet vahi

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शीत वही लगता है हवा मैं नमी है। एक शीत चुभन भरी कुछ गमी है। लगता है शामें कुछ खफा है। लगती ना मन पर, हवा रुसवा है।। बढ़ भी रहा है अँधेरा देखो। शीत की चुभन भी बढ़ रही है। आराम की आस बस। एक पल का सुकून नहीं।। बढ़ रहा दुख का सागर। तल कही दिखता नहीं। छोर की तलाश जारी। अँधेरे में हवा फिर डरा रही।। सोच सकते हो कितना दुर्गम है। मेरा पथ कितना पथरीला है। आस का भी रहा दामन नहीं। सांसे भी अब जमने लगी।। लगता है दम निकलने को है। जैसे साँसे थमने को है। कुछ पल फिर याद में बीते। समय निकल गया तब अहसास ही।। लगता है कट कई राह भी। रहा नहीं कुछ सहने को भी। आगे बढ़ु कैसे शीत घनी अँधेरा वही। लगता है थमी नहीं जीवन की विकट घङी।। -कवितारानी।

एकान्त वर दो / Akant var do

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एकान्त वर दो वो जो पाप जग में भरते हैं। जीने नहीं देते, ना मरनें देते हैं। करते हैं जान बुझ कर शेतानियाँ। ऐ मेरे रब सिखा दे उन्हें कारस्तानियाँ।। खुद की किमत कोढ़ी की नहीं है। जग को जो बेमोल दिखाते है। मन से मैले पापी जन ये।   खुद जीने ना जीने देते हैं।। अस्त्र उठाके अपना काम कर दो। लीला इनकी तुम हर ही लो। अधिकार नहीं जीना का इनको। अनाधिकार कर प्राण हर लो।। मैं एक राही सपनों का पहरेदार था। चल रहा अनजान लालायित था। सच्चा मन का साथ चाहा। लुट गया अंतिम क्षण तक गिङगिङाया।। उसको भी गिङगिङाने दो। बदला मांगू तो सजा दो। न्याय संगत बात है आई। मुझे अपने पर तरस है आई।। मन की मेरे थोङी सुन लो। सुकून मिले आत्मा को कुछ कह दो। मन का मेरे बोझ बढ़ रहा। सोंच सकुं कुछ ऐसे कर दो, वर दो, वर दो।। -कवितारानी।

मन का मैल / man ka mail

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  मन का मैल मिट्टी का हूँ पिघल जाता। कोई प्यार से बोले हॅस जाता। फर्क ना पङता मन का अब। मन का रहा ना ये मनका अब।। छोर दुर अब साँसे अधूरी। बेठोर जिन्दगी तन की पहरी। रुक-रुक कर आती जाती। दिल को भरकर बह भी जाती।। खैल-खैल में याद आया। समय बिताया खोई काया। मन मांजी मांझ गया जब। अब चुभती रोशनी आवरण नहीं  अब।। बेपरदा मन बैसाखी खोजे। आस लगी है जिने की जो। लुट तो गया कण-कण से वो। टुट रहा पल-पल बैरागी जो।। कौन घङी कौन काम आया। खोज रही निर्मोही बन काया। डर लगता कोई शिकार ना होवे। ये मनका किसी का बैरी ना होवे।। सब ओर से आहट आती। बैरी जग मे बहुत से भरते छाती। अब किसको मन की सुनाये। एकांत बैठ लिखते जाये।। -कवितारानी।

अबके मुझे नजर ना आना / abke mujhe najar na aana

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  अबके मुझे नजर ना आना कल शाम की बात है। घोर भीङ मे था उजाला। देख ना पाया एक पल को। चुभता रहा घोर सारा। मेरी ना किरण आयी। बनने ना दी मैंने परछाई। दूर तक मन घबराया। संक्रमण से बच ना पाया। काली अँधियारी रात थी। बैठ अकेला बहुत पछताया। क्यों गया उस भीङ भरी में। मिल ही जब उससे वैसा ना पाया। रुकना था कुछ ओर देर ही। लङ जाता उस रोशनी से ही। चुर-चुर तु अब होता है। टुटता है और बिखरता है। क्यों उसको तुने ना समझाया। मिट्टी है घोर काली तु। गंदगी में सङी सी है नाली तू। तेरी दुर्गंद ने दम घोट दिया है। ऊपर तुने लेप किया है। जग को दुषित कर रही है। कल शाम से व्यथित कर गई है। अबके मेरे आस पास ना आना। अबके मुझे कुछ ना समझाना। -कवितारानी।

काश कभी / kash kabhi

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  काश कभी वो सुने लम्हे टिस ना देते। अकेले में आँखे नम ना होती। कभी आधे-अधुरे ख्वाब ना होते। काश कभी घात ना होती।। विश्वास अमर बना वो रहता। मन की करते मन की ही होती। सबके कहने सच ना होते। काश कभी कोई ना रोते।। खुशियाँ लम्हे हर बार होती। बैठे बिठाये तन की साँस होती। सुकून चैन हर दम भरते। काश कभी आहे ना भरते।। निर्मोही कुछ दुखियारे मिले। अपने मन की करने वाले मिले। था ही लेकर कुछ सपने चले। थे जो सपने काश पुरे होते।। टुटे सपने टिस ना देते। आधे जिये वो ना रिझते। सपने का साकार होना था। काश कभी मन ना रोना था।। काश कभी मैं ना होता। सपने ना जीता ना ठोकर खाता। ना कोशिशें हजार होती। काश कभी अँखियाँ ना बहती।। -कवितारानी।

दीपावली की शुभकामनायें / deepawali ki shubhkamanayen

दीपावली की शुभकामनायें दीप दान का उत्सव आया, हर्षोल्लास जगाने को, घर-घर रोशन हुआ, नववर्ष बुलाने को। खुशी के पर्व को सब एक साथ बैठ मनायें, मन से बात कहूँ, दीपावली की शुभकामनायें। पाँच दिन, पाँच रंग खुशियाँ लेकर आये। हर दिन यादगार बने और स्मृति पटल पर छाये। धन तेरस को धनवैभव दोनों हाथ कुबैर लुटाये। रुप चवदस को आपका घर आँगन आप बिखर जाये। लक्ष्मी पुजन को हर छोर रोशन कर दीप जलाये। गोवर्धन पुजन कर शांत मन पवित्र पङवा मनायें। भाई दूज का अतुलनीय प्रेम जीवन नभ पर छाये। पाँच दिनों के उत्साह संग खुशियाँ महकती जाये। रोग मिटे, दोष मिटे, क्लेष शांत हो जाये। रोग मिटे, दोष मिटे, क्लेष, द्वेष शांत हो जाये। स्वच्छ निर्मल काया से उल्लास का त्योहार मनायें। मौज करना, मस्ती करना कुछ मेरा मनन हो जाये। अपनी खुशी में प्रकृति को नुकसान ना पहूँचाये। देश हित मे दीप भले, एल ई डी रास ना आये। मौज में मस्ती भली, प्रकृति को ना सताये। रंग रहे मौज का हरपल बिते गीत सा। दीपावली की शुभकामनायें।। -कवितारानी।

बचपन की यादें / bachapan ki yadein / Part-1

 मेरे मित्र के साथ बचपन की यादें part-1 कुछ यादें सजायी है मैंने,  कई पलों को संजोया है। अपनी यारी पे बीते दिनों को, इन पन्नों पर उकेरा है। रुठना मनाना कम रहा, बातों का कारवां चलता रहा। चलते-चलते यहाँ तक आ गये, तुम नये दोस्तों से मिल गये। कितना कुछ जी लिया हमनें, साथ रहकर क्या कुछ ना किया हमनें। इन्हीं कुछ पलों को याद दिलाता हूँ, चलो में तुम्हें अपने बचपन की सेर कराता हूँ। कितने मासुम थे हम, दुनिया से अनजान खुद में मस्त थे हम। दोस्ती यारी सब से थी अपनी, बात निराली थी अपनी। जब कभी गाँव की गलियों में आये तुम, मिलकर पहले मुझे मित्र कहलाये तुम। ले चलते थे हम सब को नये माहौल में, खुब रंग घोलते थे हम अपने माहौल में। कितनी कच्ची केरियों का कत्ल हुआ, पत्थरों ने अपने कितने पेङो को जख्म दिया। याद है हमनें चोरियाँ बहुत की, कभी कंद, गन्ने की तो पपीता की चोरी की। पकङे जाते तो छोङ दिये गये हमेशा, कितने अच्छे चोर हुआ करते थे हमेशा। वो बेवजह खेतों खलिहानों की हमनें सेर की, मधुमख्खियों को दंश खाये पर शहद की मौज की। क्या खुब दिन थे वो, कितने अच्छे दिन थे वो। ना कल की फिक्र हुआ करती थी, ना कल की...