मेरी खोज / meri khoj

 मेरी खोज


चल रहा है वक्त निरन्तर बन कर्मठ नैतिक ज्ञानी।

मानव हूँ मैं चलना है मुझे भी कर्मठ सा बन कर ज्ञानी।

सुनी है राहें जीन पर चलने से डर जाता यहाँ।

फिर भी ढुँढने को मन का आसरा भटक आता यहाँ।।


मनका आसरा ढूँढूँ, ढूँढूँ मन का टापरा यहाँ।

सुख-वैभव से भरा, मान, ज्ञान भरा आसरा ढूँढूँ।

जहाँ हो ठंडक मन का आराम तन का जहाँ।

जहाँ ईमानदारी, समझदारी हो समाज में ऐसी जगह ढूँढूँ आसरा।।


फिर चलते भटक गया नया आसरा ढूँढ रहा हूँ।

फिर सपने देखने लगा जो पिछले थे उन्हें भुलने लगा हूँ।

फिर नयी दुनिया की तलाश में चल दिया हूँ।

फिर मन का आसरा ढूँढ रहा हूँ, फिर नया टापरा ढूँढ रहा हूँ।।


पल-पल है दुनिया रंग बदलती हम रहते बेरंग अभी जहाँ।

हर पल जहाँ नई सोंच होती हम बैठे एक ही सोंच पर जहाँ।

ऐसे में कैसे मैल करूँ वक्त कैसे बने वो आसरा।

वक्त के साथ चल कैसे बनाए नया आसरा।।


पर रुकना सिखा हमने कहाँ, थकना हमने जाना कहाँ।

घबराये ऐसा लक्ष्य साधा नहीं, मंजिल अब दूर नहीं।

मंजिल जो सोंची है देगी वो सपनों का आसरा।

मिलेगा हमें जरूर अपने सपनों का आसरा।।


-कवितारानी।

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